Urdu Poetry: जो पढ़ा है उसे जीना ही नहीं है मुमकिन

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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जो पढ़ा है उसे जीना ही नहीं है मुमकिन
ज़िंदगी को मैं किताबों से अलग रखता हूँ
- ज़फ़र सहबाई 

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आज फिर ख़ुद से ख़फ़ा हूँ तो यही करता हूँ
आज फिर ख़ुद से कोई बात नहीं करता मैं
- तरकश प्रदीप 

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मेरे ख़्वाबों में भी तू मेरे ख़यालों में भी तू
कौन सी चीज़ तुझे तुझ से जुदा पेश करूँ
- साहिर लुधियानवी  

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कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है
मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी
- जावेद अख़्तर 

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Urdu Poetry: ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे

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