अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
कभी ये फ़िक्र कि वो याद क्यूँ करेंगे हमें
कभी ख़याल कि ख़त का जवाब आएगा
- हिज्र नाज़िम अली ख़ान
हम ने घर की सलामती के लिए
ख़ुद को घर से निकाल रक्खा है
- अज़हर अदीब
मैं अपने घर में हूँ घर से गए हुओं की तरह
मिरे ही सामने होता है तज़्किरा मेरा
- मुज़फ़्फ़र वारसी
एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक
जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा
- निदा फ़ाज़ली
Urdu Poetry: धूप निकली है बारिशों के ब'अद, वो अभी रो के मुस्कुराए हैं