अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ऐ ग़म-ए-ज़िंदगी न हो नाराज़
मुझ को आदत है मुस्कुराने की
- अब्दुल हमीद अदम
गुज़रे जो अपने यारों की सोहबत में चार दिन
ऐसा लगा बसर हुए जन्नत में चार दिन
- ए जी जोश
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ
- ख़्वाजा मीर दर्द
Urdu Poetry: माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं