अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना खो चुका हूँ मैं
कि तू मिल भी अगर जाए तो अब मिलने का ग़म होगा
- साहिर लुधियानवी
तिरे आने का दिन है तेरे रस्ते में बिछाने को
चमकती धूप में साए इकट्ठे कर रहा हूँ मैं
- अहमद मुश्ताक़
दूर तक फैला हुआ पानी ही पानी हर तरफ़
अब के बादल ने बहुत की मेहरबानी हर तरफ़
- शबाब ललित
ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई
- मुज़फ़्फ़र रज़्मी
Urdu Poetry: वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन