अमर उजाला काव्य डेस्क
मैं वो पल था जो खा गया सदियाँ
सब ज़माने गुज़र गए मुझ में
मुझ को ले जाए कहीं दूर बहाती हुई तू
तुझ को ले जाऊँ कहीं दूर उड़ाता हुआ मैं
तुम्हारी बस तुम्हारी दुश्मनी में
मैं सब से दोस्ती करने लगा हूँ
कैसे कैसे बना दिए चेहरे
अपनी बे-चेहरगी बनाते हुए
Union Budget 2024: जब शायरी में ज़िक्र हुआ रुपये-पैसे का