अमर उजाला
Mon, 10 April 2023
दफ़्न कर सकता हूँ सीने में तुम्हारे राज़ को
और तुम चाहो तो अफ़्साना बना सकता हूँ मैं
- मजाज़ लखनवी
सौ मिलीं ज़िंदगी से सौग़ातें
हम को आवारगी ही रास आई
- अली सरदार जाफ़री
इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नही
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद
- कैफ़ी आज़मी
देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं
- जां निसार अख़्तर
Nirmal Verma: निर्मल वर्मा के साहित्य से चुनिंदा कोट्स