Gulzar Poetry: गुलज़ार के चुनिंदा शेर

Gulzar Poetry: गुलज़ार के चुनिंदा शेर 

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आइना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई 

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हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते 

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शाम के साए बालिश्तों से नापे हैं
चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में 

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ये दिल भी दोस्त ज़मीं की तरह
हो जाता है डाँवा-डोल कभी 

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एक सन्नाटा दबे-पाँव गया हो जैसे
दिल से इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है बिछड़ जाने का 

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Urdu Poetry: आईने पर चुनिंदा शेर

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