अमर उजाला काव्य डेस्क
सूरज हूँ ज़िंदगी की रमक़ छोड़ जाऊँगा
मैं डूब भी गया तो शफ़क़ छोड़ जाऊँगा
- इक़बाल साजिद
उस की यादों ने उगा रक्खे हैं सूरज इतने
शाम का वक़्त भी आए तो सहर लगता है
- वसीम बरेलवी
मैं इस लिए हुजूम का हिस्सा नहीं बना
सूरज कभी नुजूम का हिस्सा नहीं बना
- शाहिद माकुली
यार क्या ज़िंदगी है सूरज की
सुब्ह से शाम तक जला करना
- अमीर क़ज़लबाश
कभी तो सर्द लगा दोपहर का सूरज भी
कभी बदन के लिए इक किरन ज़ियादा हुई
- नसीम सहर
Urdu Poetry: आज के चुनिंदा शेर जो ज़िंदगी के सलीके बताते हैं