अमर उजाला काव्य डेस्क
चाहे कोई दार्शनिक बने. साधु बने या मौलाना बने. अगर वो लोगों को अंधेरे का डर दिखाता है, तो ज़रूर वो अपनी कंपनी का टॉर्च बेचना चाहता है।
देश की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने मेँ जा रही है। पाव ताकत छिपाने मेँ जा रही है, शराब पीकर छिपाने में, प्रेम करके छिपाने में, घूस लेकर छिपाने में, बची पाव ताकत से देश का निर्माण हो रहा है, तो जितना हो रहा है, बहुत हो रहा है। आख़िर एक चौथाई ताकत से कितना होगा।
जो गिरनेवाला है, वह नहीं देख सकता कि वह गिर रहा है। दूर से देखनेवाला ही उसके गिरने को देख सकता है।
नारी-मुक्ति के इतिहास में यह वाक्य अमर रहेगा कि – ‘एक की कमाई से पूरा नहीं पड़ता।’
सोचना एक रोग है, जो इस रोग से मुक्त हैं और स्वस्थ हैं, वे धन्य हैं।
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