अमर उजाला काव्य डेस्क

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'ग़ालिब' बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे 

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मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दआ क्या है

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निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

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बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या कुछ
कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई

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क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ
मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में

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Urdu Poetry: परवीन शाकिर के चुनिंदा शेर

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