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Mera Deen Mera Dharam

मेरे अल्फाज़

मेरा दीन मेरा धर्म

Optimus “Dabangg

1 कविता

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फिरकापरस्ती उन रहनुमाओं की
कि तारीखें हिंदुस्तान और पाकिस्तान हुईं
फिर हम क्या कम थे
कुछ हिन्दू हुए, कुछ मुसलमान हुए

फिर कतल हुए दहशत फैली
अस्मत लूटी घरबार छूटी
कुछ को तो दंगों ने निगला
कुछ जंग की आग में भेंट हुए

पर खेल तो ये शुरुआती था
माहौल बड़ा जज्बाती था
गैरों को तो भगा दिया हमने
पर अपनों से युद्ध जरूरी था

फिर रंग बंटी लिबास बटे
वोट बंटी विश्वास टूटे
भाषाएं तो भाषाएं जानवर तक हमने बांटे

जय मेरा दीन जय मेरा धरम
बस बात यहीं आ सिमटी है
गरीबी से बीमारी से अंधेरों से या बेरोजगारी से
अब कौन सी लड़ाई लड़नी है

अर्धरात्रि के उस सवेरे को अरसा अब तो बीत चुका
बच्चे तड़पे हो दर्द हमें
वो इंसान कब का मर चुका
नग्न बहनें बिलखती माताएं सब तो है हमने देख लिया

इस हिंदुस्तान के बाशिन्दे को बस एक ही फैसला करना है
बाजी को हक में करने को जीना है या मर जाना है

अब आ जाएं समझौता करने
खुदा यहां या भगवान स्वयं
अव्वल कौन बताये इनको
मेरा दीन या मेरा धरम

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