मेरा दीन मेरा धर्म

26 Views
Updated Mon, 18 Sep 2017 12:56 PM IST

फिरकापरस्ती उन रहनुमाओं की
कि तारीखें हिंदुस्तान और पाकिस्तान हुईं
फिर हम क्या कम थे
कुछ हिन्दू हुए, कुछ मुसलमान हुए

फिर कतल हुए दहशत फैली
अस्मत लूटी घरबार छूटी
कुछ को तो दंगों ने निगला
कुछ जंग की आग में भेंट हुए

पर खेल तो ये शुरुआती था
माहौल बड़ा जज्बाती था
गैरों को तो भगा दिया हमने
पर अपनों से युद्ध जरूरी था

फिर रंग बंटी लिबास बटे
वोट बंटी विश्वास टूटे
भाषाएं तो भाषाएं जानवर तक हमने बांटे

जय मेरा दीन जय मेरा धरम
बस बात यहीं आ सिमटी है
गरीबी से बीमारी से अंधेरों से या बेरोजगारी से
अब कौन सी लड़ाई लड़नी है

अर्धरात्रि के उस सवेरे को अरसा अब तो बीत चुका
बच्चे तड़पे हो दर्द हमें
वो इंसान कब का मर चुका
नग्न बहनें बिलखती माताएं सब तो है हमने देख लिया

इस हिंदुस्तान के बाशिन्दे को बस एक ही फैसला करना है
बाजी को हक में करने को जीना है या मर जाना है

अब आ जाएं समझौता करने
खुदा यहां या भगवान स्वयं
अव्वल कौन बताये इनको
मेरा दीन या मेरा धरम

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
 

अमर उजाला ऐप चुनें

सबसे तेज अनुभव के लिए

क्लिक करें Add to Home Screen