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बनारस की वो शाम

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Updated Sat, 11 Aug 2018 01:56 PM IST

चहल पहल से सराबोर थी,
काशी की वो शाम,
जिस पल पहुंचा मै बनारस,
रहने शिव के धाम,
स्टेशन से बाहर आकर,
सोचा कैसे जाऊ,
हर कोई रिक्शा ऑटो मुझको,
कहे सर मै ले जाऊ,
शाम का उत्सुकता से मुझको,
था तब इंतजार,
गंगा आरती देखने की,
इच्छा थी बेशुमार,
बैठ रिक्शे मै तब देखू,
काशी के वो नगरी,
रंग बिरंगे रोशनी से,
गलियों में रौनक बिखरी,
तंग गली के मुहाने पर,
रिक्शा आकर ठहरा,
बोला मुझको साहब आऔ,
पास है घाट सुनहरा,
बेसब्री से जिस पल का था,
बरसों से इंतजार,
वही आकर आज रूका मै,
मन मे था सुख संचार,
पहुंच घाट पर देखकर,
आनंद हृदय समाए,
गंगा समुख हाथ जोडकर,
हर कोई भजन सुनाए,
बडे बडे थालो मे सबने,
दिऐ की लौ जलाई,
कर मुद्राएँ हाथो की,
आरती प्रेम से गाई,
बैठ देख मे स्तब्ध था,
रहा था भाग्य सराहए,
बस मन को अब इच्छा थी,
बाबा के समुख जाए,
उस संध्या का वरनन,
करना ना था यूँ आसान,
बनारस की शाम देखकर,
काशी को किया प्रणाम।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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