भारी पड़ सकती है खतरे की अनदेखी

Uttar Kashi Updated Mon, 27 Aug 2012 12:00 PM IST
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उत्तरकाशी। असी गंगा और भागीरथी के जलागम क्षेत्र में लाखों घनमीटर जल भंडार वाली झीलों की मौजूदगी तथा इनके आसपास बादल फटने से हुई तबाही के बावजूद किसी वैज्ञानिक दल ने मौके पर जाकर जांच नहीं की। जानकारों का कहना है कि इस तरह खतरे की अनदेखी हजारों लोगों पर भारी पड़ सकती है। वर्ष 1978 में भी इसी तरह बादल फटने से कनोडिया गाड में उमड़े मलबे ने गंगनानी में भागीरथी का प्रवाह आठ घंटे तक रोक दिया था। यहां बनी झील टूटने से उत्तरकाशी को जलप्रलय का सामना करना पड़ा था। तब घटना के तीसरे दिन वैज्ञानिक दल ने बादल फटने वाले स्थल का अध्ययन सर्वेक्षण किया था।
समुद्र सतह से 10 हजार फीट की ऊंचाई पर असी गंगा के उद्गम वाली डोडीताल झील की गहराई का अब तक वैज्ञानिक पता नहीं लगा पाए। दयारा गिडारा के ऊपर डोडीताल की ही तरह 16 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर एक और विशाल झील है। इन दोनों झीलों में ही लाखों घन मीटर पानी है। आसपास ही कई छोटी झीलें हैं। यदि कभी इनके आसपास बादल फटा तो पानी के साथ आने वाले मलबे से कई गांव एवं उत्तरकाशी तबाह हो सकता है।
भागीरथी घाटी में ही 24 जुलाई को और फिर 3 अगस्त को डोडीताल के आसपास बादल फटने से उफान ने भारी तबाही मचाई। 21 अगस्त को यहीं ऊपरी हिमालय क्षेत्र में बादल फटने से हर्षिल के आगे गुमगुमनाला में करीब 20 मिनट तक भागीरथी का प्रवाह रुक गया था। लोगों का कहना है कि शासन-प्रशासन को आईटीबीपी, सेना एवं नेहरू पर्वतारोहण संस्थान की मदद लेकर बादल फटने वाले स्थलों का निरीक्षण कराके उनसे रिपोर्ट लेनी चाहिए थी। खानापूर्ति के लिए यहां नई दिल्ली से एक वैज्ञानिक ने चार दिनों से उत्तरकाशी में डेरा डालकर यहीं रिपोर्ट तैयार की और यहां से लौटते समय स्थानीय प्रशासन तक को जानकारी नहीं दी।

वैज्ञानिक ने कोई रिपोर्ट नहीं दी
उत्तरकाशी। डीएम डा.आर.राजेश कुमार ने स्वीकारा कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के वैज्ञानिक सूर्यप्रकाश उनसे मिले जरूर थे। उनकी 8 से 12 अगस्त तक उत्तरकाशी में रहने की सूचना है। लेकिन नई दिल्ली लौटते समय न वे उनसे मिले और न ही उन्हें कोई रिपोर्ट अथवा जानकारी सौंपी है।

बादल फटने वाले स्थानों की जांच जरूरी
उत्तरकाशी। गढ़वाल हिमालय ट्रैकिंग एंड माउंटेनियरिंग एसोसिएशन के मदन सिंह गुसाईं एवं जयेंद्र राणा ने डीएम को पत्र लिखकर कहा कि चीन की सीमा से लगे इस क्षेत्र में बादल फटने से हो रहे धमाकों के असर का अध्ययन कराया जाना चाहिए। कुछ वर्ष पहले भारत सरकार ने इसी तरह बादल फटने से लेह लद्दाख में हुई तबाही को लेकर चीन पर संदेह का संकेत दिया था। जहां बादल फटे वहां से मिट्टी के नमूने लेकर इसकी जांच कराई जानी चाहिए।

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