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आपदा की भेंट चढ़ा डोडीताल का हुस्न

Uttar Kashi Updated Sat, 18 Aug 2012 12:00 PM IST
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उत्तरकाशी। कभी कुदरत यहां पूरी सज-धज के साथ बांहे पसारे सैलानियों का इंतजार करती थी। भगवान गणेश की जन्मस्थली कहा जाने वाला 10 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित डोडीताल का हुस्न आपदा की भेंट चढ़ दागदार हो गया है। बीते तीन अगस्त की रात को असी गंगा घाटी तथा भटवाड़ी से लेकर जिला मुख्यालय क्षेत्र में तबाही के चलते साफ-शफ्फाक नीले पानी वाली यह झील मटमैले, कीचड़ गंदगी से पटे गड्ढे में तब्दील हो गई है। बदले मंजर को देखकर सिर धुनने को मन करता है।
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वन विभाग के चौकीदार नत्थी सिंह और लठैत नत्थी सिंह आपदा वाली रात को डोडीताल क्षेत्र में ही थे। उन्होंने बताया कि तेज धमाके के साथ दरबा टाप और वन विभाग के गेस्ट हाउस के पिछले हिस्से वाले गदेरे से आए मलबे ने झील के पानी को इस तरह धक्का मारा कि एक बारगी तो वह जल विहीन हो गई। बाद में धीरे-धीरे इसमें पानी तो भरा लेकिन अब चारों ओर मिट्टी-पत्थर और पेड़ों के मलबे नजर आ रहे हैं। झील के किनारे वाली कैंपिंग साइट पर मलबा भरा पड़ा है। झील से असी गंगा के उद्गम वाले स्थान पर बने ढाबे भी पानी के उफान में बह गए। डोडीताल तक पहुंचने वाली गंगोरी-संगमचट्टी तक की 10 किमी सड़क तहस-नहस हो गई। यहां से अगोड़ा होते हुए 21 किमी ट्रैक जगह-जगह क्षतिग्रस्त होने के साथ ही रास्ते की पुलिया भी ढह गई हैं। ऐसे में कभी देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहे डोडीताल के पर्यटन पर टिकी क्षेत्रवासियों की आजीविका खतरे में पड़ गई है।

मलबा साफ करने की गुजारिश
ट्रैकिंग व्यवसाय से जुड़े अगोड़ा के मान सिंह, भंकोली के जय सिंह आदि ने वन विभाग से डोडीताल में जमा मलबा साफ कर इसमें मलबा घुसने से रोकने के इंतजाम करने तथा पहुंच मार्ग को दुरुस्त करने की मांग की है। उन्होंने विश्वास जताया कि डोडीताल का सौंदर्य फिर लौटेगा और यह फिर पर्यटकों से गुलजार होगा।
आईटीबीपी का दल जाएगा इस ट्रैक पर
आईटीबीपी 12वीं वाहिनी का एक दल 24 अगस्त को उत्तरकाशी से डोडीताल, दरबा टॉप होते हुए हनुमानचट्टी यमुनोत्री तक जाएगा। इस अभियान से इस ट्रैक के फिर आबाद होने तथा पर्यटकों के इस ओर आकर्षित होने की उम्मीद है।
हजारों पेड़ धराशायी
बीते 12 अगस्त को डोडीताल क्षेत्र का दौरा कर लौटे वन विभाग के एसडीओ एनबी.शर्मा और रेंजर आशीष डिमरी ने बताया कि बादल फटने के साथ डोडीताल और असी गंगा में आए उफान से हजारों की संख्या में थुनेर, फर, देवदार, मौरू, खर्सू आदि के पेड़ धराशायी हो गए। नदी के कटाव से कई हेक्टेयर जंगल की भूमि में धंसाव है।

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