मानवाधिकार संरक्षण के प्रति राज्य सरकार उदासीन

Udham singh nagar Updated Sun, 09 Dec 2012 05:30 AM IST
काशीपुर। मानवाधिकार संरक्षण के प्रति राज्य सरकार गंभीर नहीं है। यही कारण है कि राज्य गठन के 11 साल बाद सुप्रीम कोर्ट तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दबाव में 19 जुलाई 2011 को उत्तराखंड राज्य मानवाधिकार आयोग के गठन की अधिसूचना जारी की गई। अब आलम यह है कि आयोग के इकलौते सदस्य को तीन माह से वेतन तक नहीं मिला है। यहां तक कि उनके पास न गाड़ी है न ड्राइवर। कामकाज निपटाने के लिए केवल दो कर्मचारियों का सहारा है।
सूचना अधिकार के तहत मौलाना अबुल कलाम आजाद अल्पसंख्यक कल्याण समिति (माकाक्स) के केंद्रीय अध्यक्ष नदीम उद्दीन एडवोकेट द्वारा गृह विभाग से मांगी गई सूचनाओं में यह उजागर हुआ। 21 नवंबर को उपलब्ध सूचना के अनुुसार मानवाधिकार आयोग के लिए अब तक सरकार ने ढांचा स्वीकृत नहीं किया है। प्रकरण में वित्त विभाग की सहमति प्राप्त की जा रही है। सेवानिवृत्त राजेश टंडन ने तीन अगस्त 2012 को आयोग के पहले सदस्य के रूप में कार्यभार ग्रहण किया, इनके प्रभार ग्रहण करने के बाद इनके कार्यालय, स्टाफ आदि की व्यवस्था करने का कार्य शासन द्वारा पुलिस महानिदेशक को सौंप दिया गया। सहायक पुलिस महानिरीक्षक एवं लोक सूचना अधिकारी सतीश कुमार शुक्ल द्वारा सूचना के जवाब में कहा गया कि आयोग सदस्य को अब तक वाहन उपलब्ध नहीं कराया गया।
साथ ही शासन से आदेश प्राप्त नहीं होने पर उन्हें वेतन का भुगतान भी नहीं किया गया है। उनके वैयक्तिक सहायक के रूप में पूर्व से राज्य निर्माण आंदोलनकारी सम्मान परिषद में नियुक्त दिनेश प्रसाद सेमवाल एवं चतुर्थ श्रेणी के पद पर कार्यरत सुनीता भट्ट को आयोग सदस्य के साथ अग्रिम आदेश तक यथावत कार्य करने के निर्देश प्राप्त हुए हैं। वहीं, इन दोनों के वेतन का भुगतान राज्य निर्माण आंदोलनकारी सम्मान परिषद के बजट से किया गया है।

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