हवा में उड़ा भू-नियमितीकरण का शासनादेश

Udham singh nagar Updated Sat, 08 Dec 2012 05:30 AM IST
सितारगंज। बैगुल डैम क्षेत्र में बसे गांवों में वन भूमि पर अतिक्रमण के मामले में दो परस्पर विरोधी शासनादेश विभागों के गले की फांस बन गए हैं। एक तरफ तत्कालीन यूपी सरकार ने निष्प्रयोजित भूमि से अतिक्रमण हटाने के आदेश किए तो दूसरी ओर अतिक्रमण कर जमीन पर काबिज काश्तकारों को भू-नियमितीकरण का शासनादेश जारी कर दिया, जिससे वन विभाग को भूमि हस्तांतरण का आदेश सिरे नहीं चढ़ा और कब्जेदारों के भू-नियमितीकरण का शासनादेश भी हवा में उड़ गया। यही कारण है, हर वर्ष सैकड़ों एकड़ जमीन पर कब्जे हो रहे हैं और राजस्व, सिंचाई एवं वन विभाग के एक-दूसरे पर मामला टालने से अतिक्रमणकारियों के हौसले बुलंद हैं।
वर्ष 1958 (1366 फसली) में पंडरी, लौका, नकहा और गोठा गांव की 568.2 एकड़ भूमि राजस्व में दर्ज थी, जो 1964 (1371 फसली) में बैगुल सागर को अधिग्रहीत कर दी गई। इसी बीच 1964 में इस भूमि पर काश्तकारों का कब्जा हो गया और 1968 में सिंचाई विभाग द्वारा इन काश्तकारों को कृषि कार्य के लिए पट्टे आवंटित कर दिए गए। 1973 में पट्टे रिनुअल भी हुए, इसके एवज में पट्टेदारों से आपाशी वसूली जाती थी।
तत्कालीन उत्तर प्रदेश शासन ने मार्च 1975 में राजस्व की 568.2 एकड़ भूमि में से निष्प्रयोजित 413.228 एकड़ भूमि वन विभाग को हस्तांतरित किए जाने के आदेश दिए, जिसमें जिलाधिकारी द्वारा भूमि खाली कराकर वन विभाग को सौंपी जानी थी, लेकिन हस्तांतरण की प्रक्रिया पर अमल होने से पूर्व एक नवंबर 1975 को जारी शासनादेश संख्या-7262/14-2-742/72 में 1973 तक के हरिजन एवं पिछड़े परिवार और 1966 के अन्य परिवारों को भू-नियमितीकरण के आदेश हो गए, परंतु भू-नियमितीकरण की कार्रवाई नहीं हुई, लिहाजा ये परिवार अब तक नियमितीकरण की मांग करते आ रहे हैं। वहीं, यूपी शासन में दो परस्पर शासनादेशों के जारी होने से सिंचाई विभाग की शिथिलता के कारण मामला ठंडे बस्ते में चला गया। उधर, बीती 23 नवंबर को ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री बहुगुणा को ज्ञापन सौंपकर नियमितीकरण के मामले में न्याय की गुहार की। सीएम ने जिलाधिकारी बीके संत से मामले रिपोर्ट भी मांगी है।

-बैगुल सागर के वन और राजस्व विभाग की 6843 एकड़ भूमि विभाग को अधिग्रहीत हुई थी, जिसमें 4967 एकड़ भूमि प्रयोग में आई थी। शेष 1810 एकड़ भूमि वन विभाग को और 66 एकड़ राजस्व विभाग को वापस कर दी थी, इसमें से करीब 25 एकड़ भूमि में अतिक्रमण था, जिसे खाली कराकर वन को हस्तांतरित की गई।
-एके सैंगर अधिशासी अभियंता, सिंचाई खंड बरेली।

-केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति के बिना नियमितीकरण की कार्रवाई नहीं की जा सकती है। भारतीय वन संरक्षण अधिनियम 1980 लागू होने के बाद नियमितीकरण या भूमि हस्तांतरण के मामलों में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति लेना आवश्यक है। बैगुल सागर की निष्प्रयोजित भूमि विभाग को हस्तांतरित होनी थी, लेकिन सिंचाई विभाग ने अब तक हस्तांतरित नहीं की और उस भूमि पर कब्जे हो गए।
-आनंद चंद्र आर्य, उपखंड अधिकारी, बाराकोली वन क्षेत्र, सितारगंज ऊधम सिंह नगर।

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