बंगाली समाज में है देवी दुर्गा का विशेष दर्जा

Udham singh nagar Updated Wed, 24 Oct 2012 12:00 PM IST
सितारगंज। वेदों के अनुसार शारदीय दुर्गा पूजा को असमायिक कहा गया है। युद्ध में रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए श्रीराम ने यज्ञ कर महाशक्ति देवी दुर्गा का आह्वान किया था। ग्रंथों के मुताबिक उस यज्ञ के पुरोहित महापंडित रावण स्वयं थे। यज्ञ के पश्चात प्रकट हुई देवी के वरदान से ही श्रीराम ने लंकापति रावण का संहार करने में कामयाबी पाई थी। बंगाली समुदाय में देवी दुर्गा मां का विशेष दर्जा है और षष्टी के दिन प्राण प्रतिष्ठा कर मां की पूजा आरंभ करते हैं। मन्नतें पूरी होने पर मां के चरणों में सुहाग साड़ी, शंखनिर्मित चूड़ी, सिंदूर, आलता, फूल, नारियल आदि का प्रसाद अर्पित हैं।
वेदों एवं धार्मिक ग्रंथों में शरद ऋतु में होने वाली दुर्गा पूजा का वर्णन मिलता है। लंकेश रावण द्वारा सीता माता का हरण करने के पश्चात श्रीराम ने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई कर दी थी। कई दिनों तक चले भयंकर युद्ध के बावजूद रावण को जीतना संभव न होने पर देवताओं ने श्रीराम से आध्यशक्ति महामाया की अकाल पूजा करने की सलाह दी। यज्ञ के लिए श्रीराम ने महापंडित रावण से पुरोहित बनने का अनुरोध किया। उद्देश्य जानने के बावजूद रावण ने पुरोहित बनना सहर्ष स्वीकार किया। गुरु वशिष्ठ 108 कमल से मां के चरणों में आहुति देने की सलाह दी। ग्रंथों के अनुसार महामाया ने अंतिम कमल छिपा दिया। पूजा पूरी न होती देख श्रीराम ने कमल के स्थान पर अपने नेत्र को अर्पण करने के लिए तलवार निकाल ली। उसी वक्त मां शक्ति ने प्रकट होकर श्रीराम को विजयी होने का वरदान दिया, तब से मां देवी दुर्गा की शारदीय पूजा आरंभ हुई।
महिशि मर्दिनी देवी दुर्गा को सर्व शक्तिशाली आध्यशक्ति जगत जननी कहा जाता है। गुरु शंकराचार्य ने नवरात्र के अंतिम पांच दिन देवी की आराधना करने की युक्ति देते हुए कहा था कि पहले पांच दिन की पूजा से देवी जागृत होती हैं और षष्टी के दिन कैलाश पर्वत को छोड़ देवी भक्त के घर में आविर्भाव होती है। इसी कारण बंगाली समुदाय के लोग मंदिरों में स्थापित माता की मूर्ति में षष्टी के दिन प्राण प्रतिष्ठा कर पूजा आरंभ करते हैं। मन्नतें पूरी होने पर मां के चरणों में सुहाग साड़ी, शंखनिर्मित चूड़ी, सिंदूर, आलता, फूल, नारियल एवं प्रसाद अर्पित करतेे हैं।

देवी दुर्गा करती हैं हर मनोकामना पूरी
शक्तिफार्म के दुर्गा मंदिर के पंडित निधिर मुखर्जी और पंडित सत्य चक्रवर्ती ने बताया बंगाली समुदाय में मान्यता है कि अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा करने से जिन मनोकामनाओं की पूर्ति होती है, अकेले देवी दुर्गा की आराधना से उन सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। इसी कारण बंगाली बाहुल्य के लोग देवी दुर्गा को मानते हैं और उनके दुर्गा महोत्सव को अन्य पर्व से भी बढ़कर धूमधाम से मनाया जाता है।

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