नशाखोरी में हमें नहीं छू पाएगा हिमाचल

Udham singh nagar Updated Fri, 20 Jul 2012 12:00 PM IST
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रुद्रपुर। औद्योगिक नीति, विकास और बागवानी में हम हिमाचल प्रदेश के आसपास भी नहीं टिकते। मगर नशाखोरी में हम हिमाचल से अव्वल हैं। नशा करने के हमारे रिकार्ड को अब हिमाचल नहीं छू पाएगा। दो अक्टूबर से हिमाचल में जानलेवा गुटखा और तंबाकू पर पूर्ण प्रतिबंध लगने वाला है। हरियाणा ने भी तंबाकू पर प्रतिबंध लगाकर आईना दिखाने का काम किया है। जन स्वास्थ्य के हित में इन राज्यों की पहल का प्रदेश सरकार पर कोई असर नहीं दिखता है। राज्य में गुटखा और तंबाकू का बाजार लगातार फैल रहा है। इसके साथ ही कैंसर के मरीज भी बढ़ रहे हैं।
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ऊधमसिंह नगर जिले में एक दशक पहले तक गुटखा और तंबाकू जनित बीमारियों के तीन चार मरीज रोजाना चिकित्सालयों में पहुंचते थे। अब यह संख्या बढ़कर 120 से भी अधिक हो चुकी है। जग जाहिर है कि गुटखा और तंबाकू दोनों ही जानलेवा हैं। मगर किसी भी चीज की लत इंसान को गुलाम बना देती है। नशा करने वालों में युवाओं की तादात ज्यादा है। जिले के सरकारी और गैर सरकारी अस्पतालों में रोजाना 225 मरीज नाक, कान व गला रोग विशेषज्ञों के पास पहुंच रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इनमें से 60 से 65 फीसदी गुटखा व तंबाकू के सेवन से बीमार पाए जाते हैं।
जिले में गुटखे और तंबाकू का कारोबार इस कदर बढ़ा है कि एक दशक पहले तक जो कारोबार लाखों में था। अब यह 6 से 7 करोड़ रुपये प्रति माह पहुंच गया है। व्यापार मंडल जिलाध्यक्ष राजेश बंसल का कहना है कि अगर राज्य सरकार लोगों का भला चाहती है तो उसे हिमाचल की तर्ज पर तंबाकू उत्पादों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। जिस तेजी के साथ गुटखा और तंबाकू का कारोबार बढ़ रहा है, उससे लगता है कि सरकार इसे बढ़ावा देना चाहती है। उन्होंने बताया कि जिले में प्रतिमाह 6 से 7 करोड़ से अधिक का पान मसाला व तंबाकू का व्यवसाय होता है।
नहीं मानते बच्चे
रुद्रपुर। राजकीय शिक्षक संघ के जिला उपाध्यक्ष राजकुमुद पाठक ने बताया कि आजकल तो स्कूली बच्चे गुटखे व तंबाकू का सेवन कर रहे हैं। शिक्षक होने के नाते वह बच्चों को रोकते हैं, फिर भी बच्चे खाते हैं, क्योंकि उन्हें इसकी लत पड़ गई है। नशाखोरी रोकने के लिए अभिभावकों को भी बच्चों को समझाना होगा। इसके दुष्परिणामों के बारे में आगाह करना होना। समाज से नशाखोरी दूर करना सामाजिक जिम्मेदारी है।

गुटखा छोड़ कर खुश हैं
इंदिरा कालोनी निवासी मोहम्मद अली ने बताया कि नशे की लत के आगे चार साल पहले तक वह भी विवश थे। गुटखा और तंबाकू का सेवन करते थे। उन दिनों खाने में स्वाद नहीं आता था। मिर्च तेज लगती थी । एक दिन दृढ़ संकल्प कर लिया और अगले दिन से गुटखा व तंबाकू खाना बंद कर दिया। गुटखा छोड़कर आज खुश हैं।

गुटखा न मिले तो बढ़ जाती है बेचैनी
रेशमबाड़ी निवासी सोनू का कहना है कि वह तीन-चार साल से गुटखा खा रहा है। इसकी अब उसे लत पड़ चुकी है। रोजाना ही वह सात से आठ पाउच गुटखा खा जाता है। एक दिन उसे गुटखा न मिले तो वह बेचैन हो उठता है। बताता है गुटखा खाने से खाने में मिर्च लगती है और स्वाद भी फीका लगता है। वह इसे छोड़ना चाहता है, मगर इसकी लत पीछा नहीं छोड़ रही है।

स्लो प्वाइजन
जिला अस्पताल में तैनात नाक, कान व गला रोग विशेषज्ञ डा.आरके सिंहा का कहना है कि पान मसाला व तंबाकू दोनों ही स्लो प्वाइजन हैं। पहले यह मुंह को, फिर गले की कोशिकाओं को सुन्न कर देता है। धीरे-धीरे लती व्यक्ति को मसालों आदि का स्वाद भी आना बंद हो जाता है। फिर गांठ बनती है जो कैंसर में तब्दील हो जाती है। यही पान मसाला पेट में जाकर आंतों को गलाता है। इसके सेवन से गले का कैंसर, दांतों में खराबी, फेफड़े का कैंसर, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग जैसी बीमारियां होती है। इन बीमारियों से शरीर को बचाने के लिए पान मसाला व तंबाकू का सेवन बंद करना ही होगा। इसका सबसे आसान तरीका है, लती खुद छोड़ने का दृढ़ संकल्प करे।
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