आग बुझाने को न पानी और न जंगल में रास्ता

Udham singh nagar Updated Thu, 07 Jun 2012 12:00 PM IST
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काशीपुर। जंगल में लगी आग ने एक बार फिर देश की टाइगर प्रोटेक्शन की उस मुहिम को पीछे धकेल दिया है, जिनके संरक्षण के लिए सरकारें करोड़ों रुपये खर्च रही है। हर वर्ष अग्निकांड होने के बावजूद यहां न तो आग बुझाने को पानी उपलब्ध है और न ही जंगल में रास्ता बनाया गया है। इससे बाघों के अवैध शिकार और जंगलों में लगी आग से बचाव बाघ बचाने के प्रयासों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है।
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मंगलवार को हेमपुर डिपो के कैंट एरिया के जंगल में लगी भीषण आग से बाघ के चार शावकों ने झुलस कर दम तोड़ दिया। सवाल यह है कि प्रतिवर्ष इस जंगलों में आग लगने की घटनाएं होने के बाद भी वन विभाग ने कोई सबक क्यों नहीं लिया। जिस जंगल में आग लगी थी वह आर्मी का कैंट एरिया है। इसी से सटी वन विभाग की आमपोखरा रेंज है, जिसमें नेपा का जंगल भी लगता है। कैंट एरिया के जंगल में पहली बार यह आग लगी है, जबकि नेपा के जंगल में हर साल आग की घटनाएं होती है। अग्निकांड के दौरान एक बेहद चौंकाने वाली घटना भी सामने आई, जिन जंगलों में सालों से आग लगती आ रही है, वहां आग बुझाने के लिए न तो पानी की व्यवस्था है और न ही जंगलों में कोई रास्ता है। ऐसे में आग बुझाने के लिए फायरब्रिगेड वाहन को जाने में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। फायरब्रिगेड के एफएसओ संजीवा कुमार ने बताया आग लगने की सूचना आर्मी के अधिकारियों ने उन्हें दी थी, जिस पर उन्होंने फायरब्रिगेड की 5 हजार लीटर की क्षमता वाली एक गाड़ी भेज दी, लेकिन जब कर्मचारी मौके पर पहुंचे तो जंगल में गाड़ी के घुसने के लिए कोई रास्ता नहीं था। ऐसे में आर्मी द्वारा दिए गए एक छोटे टैंकर में पानी डालकर सड़क से लगभग एक किलोमीटर अंदर जंगल में लगी आग को बुझाया गया। संजीवा ने बताया नेपा के जंगलों में प्रतिवर्ष आग लगती है। वह वर्ष 2006 से तथा उनके कार्यालय में 1997 से तैनात कर्मचारी नेपा के जंगलों में आग बुझाते आ रहे हैं।
फायर लाइन तक नहीं बनवा सके अफसर
एफएसओ संजीवा कुमार ने बताया उन्होंने एक बार नेपा प्लांट के डिप्टी मैनेजर से वार्ता कर जंगल में पानी की व्यवस्था करने तथा तीन-चार कर्मचारियों को रखने की बात कही थी, लेकिन अब तक नेपा के अधिकारियों ने इस मामले में कुछ नहीं किया। जंगल में आग लगने पर फायरब्रिगेड के अधिकारियों को लगभग 20 किमी दूर काशीपुर से पानी ले जाना पड़ता है, इससे जहां समय ज्यादा लगता है, वहीं आग और विकराल रूप धारण कर लेती है। उन्होंने बताया यहां तक कि जंगल में फायर लाइन की व्यवस्था करने को भी कहा गया था, लेकिन वह भी नहीं बनाई गई।

आग से मरे अजगर और झुलसी गाय
काशीपुर। आरटीएस एंड डी (हेमपुर डिपो) में तैनात एक सिविल कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया आग से न सिर्फ बाघ के शावक मारे गए हैं, बल्कि अजगर भी झुलस कर मरे हैं। यहां तक कि एक गाय भी आग से बुरी तरह झुलसी है। उन्होंने बताया नेपा के जंगल में आए दिन आग की घटनाएं होती रहती हैं। आग से जंगली जानवरों का मरना कोई नई बात नहीं है, चूंकि मामला संरक्षित श्रेणी के टाइगर के शावकों से जुड़ा है, इसलिए वन विभाग में खलबली मची है। ग्रामीणों ने बताया रातभर बाघिन दहाड़ती रही। संभवत: यह वही बाघिन होगी, जिसके शावक आग की भेंट चढ़ गए।

शिकारियों की साजिश तो नहीं!
काशीपुर। गौशाला के ग्रामीणों के मुताबिक घने जंगल में आग लगना शिकारियों की साजिश का हिस्सा भी हो सकती है। उनका कहना है आग से सुरक्षित ठिकानों में भागते जंगली जानवर आसान शिकार बन जाते हैं। ग्रामीणों ने बताया वह लोग गांव से सटे जंगलों में पालतू जानवरों को चराने के लिए जाते हैं, लेकिन उन्हें पता है कि जंगली पशु किसी क्षेत्र में हैं, लिहाजा जानमाल की रक्षा के लिए वह जंगल के बहुत अंदर नहीं जाते हैं। आग लगने पर वन विभाग के अधिकारी पशु चराने गए किसी ग्रामीण द्वारा जलती सिगरेट-बीड़ी फेंकने को कारण बताकर इतिश्री कर लेते हैं।

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