आम आदमी का प्रतिनिधि चेहरा थे बडोनी

Tehri Updated Mon, 24 Dec 2012 05:30 AM IST
देहरादून। इंद्रमणी बडोनी उत्तराखंड के आम आदमी का प्रतिनिधि चेहरा रहे हैं। राजनीति में रहने के बावजूद उन पर कभी उंगली नहीं उठी। सियासत में वह हमेशा शुचिता के पक्षधर रहे। उत्तराखंड राज्य आंदोलन को सामूहिक रूप से आगे बढ़ाने के पक्षधर रहे। वर्ष 1994 में उत्तराखंड आंदोलन नए उभार के रूप में सामने आया तो बडोनी की पहल पर ही उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति गठित की गई, जिसमें सभी राजनीतिक दलों के चेहरों को शामिल किया गया। सादगी, सामूहिक नेतृत्व की भावना और पहाड़ के प्रति गहरी पीड़ा ने बडोनी को उत्तराखंड के गांधी के रूप में स्थापित किया। राज्य बनने के बारह वर्षों बाद बडोनी के राजनीतिक जीवन के विश्लेषण की जरूरत है।

राजनीतिक दलों की सीमाओं से ऊपर थे
उत्तराखंड के गांधी कहलाने वाले इंद्रमणी बडोनी ब्लाक प्रमुख से लेकर विधायक तक रहे। पर्वतीय विकास परिषद के उपाध्यक्ष रहे। बावजूद इसके उन्होंने सभी चुनाव बतौर निर्दलीय जीते। यूकेडी में वह बाद में शामिल हुए। जिसके बाद केवल एक बार 1989 में लोकसभा का चुनाव लड़ा। तब डेढ़ लाख से अधिक वोट लेकर वह कांग्रेस के ब्रह्म दत्त से आठ हजार वोटों से हारे थे। यूकेडी के संरक्षक रहने के बावजूद वह उत्तराखंड आंदोलन को लेकर सामूहिकता के पक्षधर रहे। उन्होंने सबको साथ लेने की कोशिशें की। उनके नेतृत्व में आंदोलन कभी भी हिंसक नहीं हुआ। यही वह दौर था जब उन्हें जनता की ओर से उत्तराखंड के गांधी का तमगा दिया गया।

बेहतरीन संस्कृति कर्मी भी थे
बडोनी राजनीतिक के साथ-साथ बेहतरीन संस्कृति कर्मी भी रहे। उन्होंने माधो सिंह भंडारी की बलिदान और शौर्यगाथा को सांस्कृतिक दृष्टि से नए अर्थ दिए। उसे राष्ट्रीय फलक पर प्रस्तुत किया। 26 जनवरी 1956 को यूपी का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्हाेंने नई दिल्ली में केदार नृत्य प्रस्तुत किया। वह स्वयं अच्छे नर्तक थे। उनकी नृत्य कला एवं शिवजनी के ढोलवादन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी स्वयं को नहीं रोक सके और नृत्य में शामिल हो गए थे।

यात्राओं से दी दिशा
बडोनी ने कई यात्राओं के माध्यम से पहाड़ को पर्यटन के नक्शे पर लाने की कोशिशें की। घुत्तू-खतलिंग ग्लेशियर की रोमांचकारी यात्रा के बाद इस क्षेत्र में पर्यटकों की आवाजाही बढ़ी। अब भी हर वर्ष यह यात्रा आयोजित होती है। उनका मानना था कि यात्राएं मनुष्य को बहुत कुछ सिखाती हैं। गांव के जन-जीवन को नजदीक से देखने-समझने का मौका मिलता है। लोगाें की दिक्कतों को समझा जा सकता है और उन्हें दूर करने के यत्न किए जा सकते हैं। श्रीविश्वनाथ शिला यात्रा भी इसी उद्देश्य से शुरू की गई। धारचूला से पहाड़ को जानो यात्रा के बाद तो उत्तराखंड आंदोलन को ही नई दिशा मिली।

उत्तराखंड के गांधी को भूले
बेशक देहरादून में घंटाघर के समीप इंद्रमणी बडोनी की एक आदमकद मूर्ति लगी है। इसके अलावा बडोनी के नाम पर कहीं कोई योजनाएं नहीं बनाई गई। यह स्थिति तब है जबकि उन्हें उत्तराखंड का गांधी कहा जाता है और पिछली भाजपा तथा वर्तमान कांग्रेस सरकार में यूकेडी को भी प्रतिनिधित्व प्राप्त है। गैरसैंण में कैबिनेट की बैठक के बावजूद किसी ने उन्हें याद नहीं किया।


राज्य आंदोलन के सर्वमान्य नेता को सलाम
सब हेड
राज्य निर्माण के लिए चले संघर्ष में इंद्रमणी बडोनी पर रहा सबका भरोसा

विपिन बनियाल
देहरादून। उत्तराखंड राज्य के लिए चले आंदोलन का नेतृत्व यूं तो जनता के हाथ रहा, मगर नेताओं की भीड़ के बीच से जो एक विश्वसनीय चेहरा चमका, वो इंद्रमणी बडोनी का था। आंदोलन के दौरान नेतृत्व झपटने के लिए हर गांव-कस्बे में जबरदस्त संघर्ष था। सियासी दलों की आंदोलन में घुसपैठ की अपनी कोशिश थी। मगर अपने सरल स्वभाव और बेदाग छवि के कारण बडोनी की अगुवाई को लोगों ने स्वीकार किया। बडोनी ने अघोषित तौर पर आंदोलन का नेतृत्व किया और राज्य स्थापना की बुनियाद रखी।
राज्य आंदोलन के दौरान उत्तराखंड के गांधी को बेहद सम्मान मिला। आंदोलन में जबकि राजनीतिक दलों के बडे़ नेता घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे, वहीं यूकेडी जैसे राजनीतिक दल से सीधे जुडे़ होने के बावजूद बडोनी को हाथाें हाथ लिया गया। आंदोलन के दौरान एकाध मौकों पर बडोनी को अपमान के कड़वे घूंट भी पीने पडे़। दो अक्तूबर 1994 को दिल्ली रैली के दौरान बडोनी से भीड़ में शामिल कुछ लोगों ने अभद्रता की थी। उनके हाथ से माइक छीन लिया गया था। मगर राज्य हित में बडोनी ऐसी घटनाओं से बेपरवाह होकर सक्रिय रहे।

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सपना पूरा होते नहीं देख पाए बडोनी
अलग उत्तराखंड राज्य की स्थापना के सपने को पूरा होते हुए बडोनी नहीं देख पाए। नवंबर वर्ष 2000 में राज्य का निर्माण हुआ, मगर 15 महीने पहले अगस्त 1999 में उनका निधन हो गया। ऋषिकेश के विट्ठल आश्रम में बडोनी के जीवन का काफी समय बीता। अपनी अंतिम सांस के लिए भी उन्होंने इसी आश्रम को चुना।


जानिए उत्तराखंड के गांधी को

जन्म: 24 दिसंबर 1925 को टिहरी के ग्यारहगांव के अखोड़ी गांव में सुरेशानंद बडोनी के घर
शिक्षा: प्रारंभिक शिक्षा अखोड़ी गांव में हुई, इंटरमीडिएट प्रतापनगर और स्नातक डीएवी देहरादून से किया।
वैवाहिक स्थिति: सिर्फ 15 साल की उम्र में सुरजा देवी के साथ विवाह हो गया। बडोनी की कोई संतान नहीं थी।
राजनीतिक सफर: वर्ष 1954 में वह 29 साल की उम्र में अखोडी के निर्विरोध प्रधान निर्वाचित। इसी साल जखोली के ब्लाक प्रमुख बने। दो बार प्रमुख रहे। इसके बाद 1967 में वह पहली बार देवप्रयाग विधानसभा
क्षेत्र से निर्दलीय विधायक चुने गए। 1974 में वह कांग्रेस के गोविंद प्रसाद गैरोेला से चुनाव हार गए। वर्ष 1978 में फिर निर्दलीय विधायक बने। जनता पार्टी की सरकार में पर्वतीय विकास परिषद के उपाध्यक्ष। वर्ष 1980 में यूकेडी में शामिल। वर्ष 1989 में टिहरी संसदीय सीट से चुनाव लडे़, मगर हार गए।


बदतर है अखोड़ी गांव का हाल
सब हेड
बुनियादी सुविधाओं के मामले में राज्य के अन्य गांवों से अलग नहीं

डा.मुकेश नैथानी
घनसाली। महात्मा गांधी की तरह ही इंद्रमणी बडोनी को भी गांवों गहरा प्यार था। यही वजह रही कि उनकी अधिकतर सक्रियता गांवों में ही रही। देश के विकास के लिए सबसे पहले गांव के विकास की गांधी जी की सोच से वे पूरी तरह सहमत थे। लेकिन राज्य बनने के बाद भी बडोनी का गांव ही आदर्श स्थिति में नहीं आ पाया। राज्य बनने के 12 साल बाद भी उत्तराखंड राज्य आंदोलन के अग्रदूत रहे बडोनी के गांव अखोड़ी की तस्वीर प्रदेश के दूसरे गांवों से अलग नहीं है। अखोड़ी में 357 परिवार रहते हैं। प्राकृतिक तौर पर अखोड़ी बेहद खूबसूरत है। सरकारी सिस्टम यदि विकास को इस गांव से जोड़ देता, तो सोने पर सुहागा हो जाता। फिलहाल तो गांव में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति बदतर है।

कुछ ऐसी है बडोनी के गांव की तस्वीर
गांव के साथ क्षेत्र के लोगों को आवागमन करवाने वाली एकमात्र घनसाली-अखोड़ी सड़क चार माह से बंद है। बालिका उच्चतर माध्यमिक विद्यालय का 17 साल में भवन नहीं बन पाया। पंचायत भवन के दो कमरों में चल रहा है यह विद्यालय। 45 छात्राओं की पढ़ाई का जिम्मा तीन शिक्षिकाओं पर। दो शिक्षिकाएं दो साल से नहीं आई स्कूल। विज्ञान और अंग्रेजी के शिक्षकों के पद रिक्त। बेसिक स्कूल में कोई स्थायी शिक्षक नियुक्त नहीं है। इस स्कूल में 70 बच्चे पढ़ रहे हैं। इंटर कालेज अखोड़ी में 20 वर्ष से प्रधानाचार्य की नियुक्ति नहीं हो पाई। भौतिक, रसायन, राजनीतिक विज्ञान के शिक्षकों के पद छह साल से खाली हैं। आयुर्वेदिक अस्पताल में चार साल से चिकित्सक नहीं है। एलोपैथिक चिकित्सालय भी भवनविहीन। पंचायत भवन में चह रहा है अस्पताल।

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