राहत की आस में पथराने लगी आंखें

Tehri Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
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चंबा (टिहरी)। आपदा में मिले जख्म नासूर बन चुके हैं। राहत की आस में आंखें पथराने लगी है। यह मामला है कंडारी और आगर गांव का। यहां के 52 परिवार कई वर्षों से दहशत के साए में जीने को मजबूर हैं। विकल्प के अभावों में बड़ी-बड़ी दरारों वाले घरों में रहने की मजबूरी है। आसमां में बिजली कड़कड़ाते ही ग्रामीण खौफ से घरों से बाहर कई बार रतजगा करते हैं।
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कंडारी गांव, आगर गांव और ग्राम पंचायत फर्त में तंत्र की संवेदनहीनता ने सारी हदें लांघ दी हैं। तीनों गांव चार वर्षों से आपदा के शिकार हैं। आपदा से उजड़े आशियाने अब तक आबाद नहीं हो पाए हैं। इन गांवों में 2007-08 में हुए भूस्खलन से कई मकान जमींदोज हो गए थे। जबकि कइयों में दरारें आई। अब यह दरारें चौड़ी होती जा रही हैं। दो दिन पहले कंडारी गांव के एक मकान के ढहने से तो अन्य ग्रामीणों की नींद भी उड़ी हुई है।
कंडारी गांव में सात परिवार, आगर गांव में 40 और ग्राम पंचायत फर्त के भितली तोक में पांच परिवार आज भी मौत के साए में जी रहे हैं। जिनके आशियाने उजड़ गए वे शरण लेकर दूसरी जगह गुजर-बसर कर रहे हैं तो कई परिवार बड़ी-बड़ी दरारों वाले मकानों में ही रहने को मजबूर हैं। गांव की जमीन लगातार खिसक रही है। विस्थापन की घोषणाए कागजों में ही सिमटी हुई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि आसमान में बादल मंडराते ही दिल की धड़कने बढ़ जाती हैं और बारिश न होने की गुहार लगाई जाती है। पूर्व प्रमुख वीरेंद्र कंडारी, प्रधान सुशीला देवी, पूर्व प्रधान धन सिंह नेगी का कहना है कि समय रहते यदि कार्रवाई न की गई तो किसी बड़े हादसे की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
कोट--
इन गांवों के विस्थापन का प्रस्ताव शासन स्तर पर विचाराधीन है। शासन के निर्देशानुसार ही गांवों का विस्थापन किया जाएगा। -एसएल सेमवाल एसडीएम
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