सात दिन बाद भी नहीं बदले हालात

Rudraprayag Updated Mon, 24 Sep 2012 12:00 PM IST
तिलवाड़ा। तहसील जखोली के सिलगढ़ और बड़मा पट्टी के गांवों में आई प्राकृतिक आपदा के सात दिन बाद भी इन गांवों की किसी ने कोई सुध नहीं ली। जहां बड़मा पट्टी के तिमली, स्वाड़ा, नौगांव, डंगवालगांव, जखोली, जखन्यालगांव, चाका सहित अन्य गांवों में काश्तकारों की आजीविका के साधन खेत-खलिहान बर्बाद हो गए हैं वहीं पांजणा गांव में लगातार जमीन धंसने से आवासीय भवन ढहने के कगार पर हैं। ये सब देखकर प्रभावितों को अब अपने भविष्य की चिंताएं सताने लगी हैं।
15/16 सितंबर को सिलगढ़ और बड़मा पट्टी के ऊपर के जंगलों में बादल फटने से कई परिवार प्रभावित हो गए थे। इन घटनाओं में छह लोग मारे गए, जबकि एक साध्वी लापता चल रही है। घटना के सात दिन बाद जब ‘अमर उजाला’ की टीम की ओर से प्रभावित क्षेत्रों का भ्रमण कर हालात का जायजा लिया गया तो पता चला कि स्थिति जस की तस है। पांजणा में जखोली-भीरी मोटर मार्ग का लगभग 50 मीटर हिस्सा धंसकर बीच गांव में चला गया है, जिससे कई आवासीय भवनों में दरारें आ गईं वहीं तीन आवासीय भवन ध्वस्त हो गए। यहां 30 परिवार आपदा से प्रभावित हैं। यदि जमीन धंसती रही, तो गांव के पास बह रहे कड़वे गदेरा का प्रवाह अवरुद्ध हो सकता है जो पूरे गांव के लिए खतरा बन जाएगा। ग्रामीणों ने बताया कि वर्ष 2007 से विस्थापन की प्रक्रिया न जाने किस स्तर पर लंबित है। पांजणा से सात किमी दूर तिमली बड़मा क्षेत्र में कई हेक्टेयर सिंचित भूमि मलबे में दबी पड़ी है। लोग अपनी मेहनत को यूं बर्बाद देख आंसू बहा रहे हैं। लोनिवि विजयनगर-तैला और जखोली-भीरी मोटर मार्ग की मरम्मत में लगा है, लेकिन सड़क की हालात देखकर लगता है कि यातायात चालू में काफी समय लगेगा।

पांजणा में इन लोगों के परिवार हैं प्रभावित
मंगल सिंह कुंवर, मोहन सिंह कुंवर, सुंदर कुंवर, विजय सिंह, अजय सिंह, कार्तिक सिंह, गुमान सिंह गुसाईं।

इनकी भी सुनिए
हम वर्ष 2007 से भूस्खलन-भूधंसाव का खतरा झेल रहे हैं। अधिकारी यहां आते हैं और चले जाते हैं। विस्थापन के नाम पर सब चुप हैं। गांव के 132 परिवारों में से 30 परिवार प्रभावित हैं। - प्रतिमा देवी, ग्राम प्रधान पांजणा।

क्षति का आकलन कर उच्चाधिकारियों को रिपोर्ट दी जा रही है, ताकि प्रभावितों को राहत दी जा सके। - दयाल लाल, राजस्व उप निरीक्षक पांजणा।

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