...खंडहरों में समाया अस्कोट का सुनहरा अतीत

Pithoragarh Updated Sat, 02 Mar 2013 05:31 AM IST
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अस्कोट। सुनहरे अतीत वाले अस्कोट के हाल धुंधला रहे हैं। कभी यहां पाल राजाओं की हुकूमत चलती थी लेकिन अब यह मामूली प्रशासनिक इकाई को तरस रहा है। अब इसका जिला मुख्यालय, तहसील मुख्यालय और विकासखंड मुख्यालय सब अलग-अलग है। इन सबका असर इसके विकास की राह को रोके हुए हैं। जबकि इस क्षेत्र के कई लोग अब भी दुनियां के कई देशों में अपनी सफलता के झंडे गाडे़ हुए हैं।
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अस्कोट सीरा राज्य की सीमाओं से लगे बमों का पड़ोसी था। कहा जाता था कि इस राज्य में 80 कोट (किले) होने की वजह से इसे अस्कोट कहा जाने लगा। राज्य के संस्थापक कत्यूरी वंश के अभयदेव ने लखनपुर को राजधानी बनाकर 1279 से राज शुरू किया। करीब 900 वर्ग किलोमीटर तक इसकी सीमाएं थी। और आजादी के 20 साल बाद 11 नवंबर 1967 को भारत सरकार ने इस रियासत को अपने अधीन ले लिया। और रियासत के अंतिम राजा टिकेंद्र पाल थे। रियासत के भारत में विलय हुए 45 साल से अधिक का समय हो गया है। लेकिन इस इलाके की तस्वीर में चमक नहीं आ सकी है।

21 सदी के दूसरे दशक में भी यह मध्ययुगीन दौर से आगे नहीं बढ़ सका है। विकास के उजाले का इंतजार खत्म नहीं हुआ है। ग्रिफ, वन, लोक निर्माण विभाग जैसे कुछ कार्यालयों को छोड़ यहां कुछ नहीं है। साल 2001 में एसपीएफ (स्पेशल पुलिस फोर्स) का प्रशिक्षण केंद्र बनाने के लिए 15 एकड़ जमीन ली गई। लेकिन यह केंद्र नरेंद्रनगर में बना दिया गया। साहसिक पर्यटन संस्थान की घोषणा भी हवाई रही। 60 लाख रुपये खर्च कर सिर्फ ढांचा ही खड़ा हो सका। यहां के लोग प्रस्तावित डीडीहाट जिले के मुख्यालय और तहसील के दर्जे की लंबे समय से मांग करते रहे हैं। लेकिन ये आवाजें अनसुनी की गई है।
पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी कर्ण बहादुर पाल, राजेंद्र पाल, बुजुर्ग लक्ष्मण पाल, दिनेश चंद्र पाल आदि कहते हैं कि विकास के नाम पर अस्कोट को सिर्फ छला गया है। अब अस्कोट प्रशासनिक इकाई को भी तरस रहा है। इसका जिला मुख्यालय 67 किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ है। तो वहीं तहसील मुख्यालय 18 किलोमीटर दूर डीडीहाट और विकासखंड मुख्यालय कनालीछीना का फासला 30 किलोमीटर है।

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