...अब भी उनकी आंखों के सामने घूम रहा है जंग-ए-मैदान

Pithoragarh Updated Wed, 05 Dec 2012 05:30 AM IST
पिथौरागढ़। 5 दिसंबर 1971 को बीते अब पूरे 41 साल हो गए हैं। लेकिन 15 कुमाऊं रेजीमेंट के फौजी धन सिंह रावत को ये दिन आज भी भूले नहीं भूलता। याद ही नहीं बल्कि वे इस दिन को ऐसे जी रहे हैं कि मानो कल की ही बात है। और युद्ध के मैदान की उस दिन की घटना आज भी उनके सामने हूबहू घूम रही है। इस युद्ध में पाकिस्तान को बुरी तरह पटखनी दी। अकेले पिथौरागढ़ जिले के ही 76 फौजियों ने शहादत दे देश की रक्षा की। हवलदार धन सिंह रावत को युद्ध के बाद पदोन्नति देकर कैप्टन का ओहदा मिला।
साल 1971 के युद्ध ने नया इतिहास ही नहीं बनाया बल्कि नए भूगोल को भी जन्मा। पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना। वहीं भारत की ओर उठने वाले निगाहों को मुंहतोड़ जवाब मिला। भारत ने अपने शौर्य एवं फौजी ताकत को दुनियां के सामने दिखाया।
पिथौरागढ़ जिले के पांखू गांव के फौजी धन सिंह अब भी अपने गांव में रहते हैं। जंग लड़ते वक्त उनकी उम्र 31 साल थी और अब वे 72 के हो चले हैं। 15 कुमाऊं रेजीमैंट के हवलदार धन सिंह रावत भारत-पाकिस्तान युद्ध के संस्मरण को सुनाते हुए खो जाते हैं। घटना का ब्यौरा बताते हुए उनकी आंखें नम हो जाती हैं। बताते हैं कि पाक से लगी पश्चिमी सीमा में वाडमेर सेक्टर पर उनकी टुकड़ी तैनात थी। गडरा सिटी पर पांच दिसबंर की रात को फायरिंग शुरू हुई। फिर कुछ घंटों बाद बमबारी हुई। इसके बाद दोनों तरफ से मुठभेड़ तेज हो गई। भारतीय सैनिकों ने बहादुरी दिखाते हुए गडरा सिटी क्रास कर 20 किलोमीटर दूर पाकिस्तान के डाली को अपने कब्जे में लिया।
बड़ी तादाद में दुश्मन के सैनिकों को मारा। 22 पाकिस्तान फौजी मार डाले गए जबकि 12 को कैद किया। सात दिसंबर को मध्याह्न के करीब सिंध राज्य के छाछरो में भारतीय तिरंगा लहराया। कैप्टन रावत बताते हैं कि आठ दिसंबर को पाकिस्तान क्षेत्र तिरगिटिया तक पहुंच गए। यहां सिंधु, व्यास एवं रावी नदी के बाद कराची था। लेकिन तब तक युद्ध विराम होने से यहीं पर फौज को यहां से आगे नहीं बढ़ने के आदेश दिए गए।
कैप्टन रावत को युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा की गई फौजियों की हौसलाअफजाई आज भी याद है। कहते हैं युद्ध शुरू होने से पहले इंदिरा जी सीमा से छह किलोमीटर दूर गडरा क्षेत्र में आईं और 9 पैरा कमाउंडो, सेकेंड राजपूताना रायफल्स, 15 कुमाऊं के सैनिकों से सीधे रूबरू हुई। तत्कालीन पीएम के साथ सांसद वाजपेयी भी थे। इस संवाद ने फौजियों को जोश से भर दिया।

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