पहली बार 1896 में हुई थी सोर में लीला

Pithoragarh Updated Mon, 22 Oct 2012 12:00 PM IST
पिथौरागढ़। सोर (पिथौरागढ़) की रामलीला का पहाड़ी अंचल में खूब शोर रहा है। इसके जलवे की वजह भी है। 117 वर्ष पुरानी यह ऐतिहासिक लीला उम्दा अदाकारी की विरासत ही नहीं बल्कि संस्कृति और समभाव का समागम भी है।
पिथौरागढ़ में लीला मंचन का श्रीगणेश तत्कालीन खंड मंडलाधीश (उप जिलाधिकारी) देवी चंद्र बगड़िया ने 1896 में किया। तब गांवनुमा इस इलाके की आबादी भी 600 के करीब थी। पंडित उमाकांत पंत रामलीला के पहले मैनेजर बने। जबकि कुंदन लाल चौधरी, हनुमान सिंह थापा, मीर असगर अली, श्याम लाल खत्री, भवानी लाल शाह, कपूर परिवार और लाला दामोदर दास खत्री आदि संस्थापकों में थे।
रामलीला कमेटी के महामंत्री जगदीश पुनेड़ा का कहना है कि 1897 के बाद और आजादी के बाद के बाद का समय ऐसा समय था जब यहां के लोगों के मनोरंजन और मेलजोल का रामलीला अहम जरिया बनी। 80 के दशक तक दूरदराज से लीला देखने वाले लोग अपने साथ खाने की सामग्री भी लाते थे। पूर्व प्रधानाचार्य महेश पंत का कहना है कि 1930 के वक्त तक लीला की खासियत शास्त्रीय संगीत और राग के जरिए संवाद थी।
रामलीला में दूसरे समुदायों के लोग भी हाथ बंटाते थे। जिसमें भाटकोट गर्ल्स इंटर कालेज की संस्थापिका लूसी डब्लू सलीवस की टीम का हर वर्ष परी नृत्य मुख्य आकर्षण रहता था। शांति व्यवस्था में अब्दुल हमीद, फैयाज की भूमिका होती थी। एक माह पहले से लकड़ी के तख्तोें को आपस में जोड़कर मंच निर्माण श्ुारू होता था। मेकअप में सफेद रंग के लिए मृदाशंख को घोला जाता था। काले एवं लाल रंग के लिए स्याही की टिक्की का प्रचलन था। रंगों को बनाने के बाद मेकअप के लिए बॉस की तिलियों को प्रयोग किया जाता था। वहीं शुरुआती दौर की लीला में सारंगी और तबला ही आधार वाद्ययंत्र के रूप में काम आते थे। नवरात्र के बाद इस बार पहाड़ी भाषा में भी लीला आयोजित होगी।

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