बदलते समय ने बढ़ाई बुजुर्गों की बेबसी

Pithoragarh Updated Mon, 01 Oct 2012 12:00 PM IST
पिथौरागढ़। हमारी परंपरा ओल्ड इज गोल्ड की मान्यता से जुड़ाव रखती थी। पर इक्कीसवीं सदी में हालात बदल गए हैं। तेज रफ्तार दौर ने क्रिकेट खेल ही नहीं जीवन जीने के तरीके भी बदल दिए हैं। इसकी झलक बुजुर्गो (सीनियर सीटिजन) के प्रति अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों में दिख रही है। ओल्ड एज बोझिल हो रहा है। जीवन की सांझ को अलग-थलग रहकर काटने वाले बुजुर्गों की बेबसी भी बढ़ रही है। इस जिले में एक अदद वृद्धावस्था आश्रम तक नहीं है।
बुजुर्गों के अनुभव समाज को मार्गदर्शन देते हैं, लेकिन उनके प्रति फर्ज को सरकारी स्तर पर ही नहीं समाज और यहां तक की कई बार परिजन भी ठीक से निभाने में फेल रहे हैं। जिले की 4.85 लाख की आबादी में करीब 63 हजार बुजुर्ग हैं। इनमें से तकरीबन 61 फीसदी बुजुर्ग ठीकठाक हाल में होने से अच्छी जिंदगी जी रहे हैं। इनमें पेशंनर्स के साथ सियासत, कारोबार और दूसरे कामधाम से जुड़े लोग हैं। मगर करीब 39 प्रतिशत लोग यानि 24,590 लोग इस पड़ाव में भी जिंदगी की जद्दोजहद से दूर नहीं है। इनमें 15,511 लोगों की जिंदगी वृद्धावस्था पेंशन के सहारे आगे बढ़ रही है, जबकि 1795 लोग अभी पेंशन की लाइन में है। गरीबी के अलावा इनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो तंगहाली, अपनों के स्नेह से महरूम एवं दूसरों पर आश्रित रहने को मजबूर हैं। बच्चों और नाती-पोतों के स्नेह को न पाने वाले वयोवृद्धों का ग्राफ बढ़ रहा है।
स्वयंसेवी संस्था रीडस के अध्यक्ष आचार्य कैलाश चंद्र लोहनी का कहना है कि अब बच्चों की तरह ही बुजुर्गों की परवरिश वक्त की मांग हो गई है। बदलते सामाजिक परिवेश और कामकाज के लिए बाहर जाने की मजबूरी ने वृद्धों के जीवन में नए किस्म की चुनौती पेश की है। पर्वतीय क्षेत्रों में हो रहे पलायन के चलते हालत और खराब हो रही है और ये बेबसी उनके जीवन की सांझ को बोझिल बना रही है।
कामधाम या दूसरी वजहों से माता-पिता को साथ न रखने की मजबूरी ने जिंदगी के आखिरी पड़ाव में एकाकीपन वालों की तादाद को बढ़ा दिया है। राजकीय महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डा. मदन चंद्र भट्ट का कहना है कि बदलते वक्त ने संयुक्त परिवार प्रथा को कमजोर किया है। इसका असर पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों की गिरावट के रूप में भी सामने आया है। बुजुर्गों का कहना है कि उन्हें बच्चों से सिर्फ लाड़ चाहिए मगर नई पीढ़ी को इस फर्ज को पूरा करने का वक्त कहां?
सरकारी तौर पर भी सीनियर सिटीजनों के लिए खास पहल नहीं की गई है। जिले में एक भी सरकारी अथवा गैर सरकारी वृद्धावस्था विश्रामगृह नहीं है। जिला समाज कल्याण अधिकारी एचएस राणा का कहना है कि वृद्धावस्था होम केयर का तीन साल पूर्व प्रस्ताव भेजा गया था पर इस पर कार्रवाई अभी लंबित है।

Spotlight

Most Read

Lakhimpur Kheri

हिंदुस्तान बना नौटंकी, कलाकार है पक्ष-विपक्ष

हिंदुस्तान बना नौटंकी, कलाकार है पक्ष-विपक्ष

22 जनवरी 2018

Related Videos

अमित शाह के इस बयान पर उत्तराखंड कांग्रेस हुई हमलावर

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा राहुल गांधी पर की गई टिप्पणी के बाद उत्तराखंड कांग्रेस आग-बबूला हो गई है।

21 सितंबर 2017

  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking Hindi news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper