07.08.09 यानि पिथौरागढ़ जिले का काला दिन

Pithoragarh Updated Tue, 07 Aug 2012 12:00 PM IST
पिथौरागढ। 07.08.09 अंकों का यह मेल रोचक जरूर लग रहा है, लेकिन इस तरीख ने पिथौरागढ़ जिले के इतिहास के पन्नों में तीन साल पहले जो भयावह प्राकृतिक त्रासदी का अध्याय जोड़ा था, उसे याद करने पर आज भी लोग सिहर उठते हैं। सात अगस्त यानि जिले का काला दिन। 43 मौतों के साथ दो गांव हमेशा के लिए पिथौरागढ़ के नक्शे से गायब हो गए। 300 नाली कृषि योग्य भूमि तबाह और पांच दर्जन मवेशी मिट्टी के ढेर में दफन हो गए थे। मुनस्यारी विकासखंड के ला, झेकला तथा बेड़ूमहर गांव में बरपे प्रकृति के इस कहर का दर्द गुजरे वक्त के साथ भले ही आज कम हो गया हो, पर वो जख्म न भरे हैं, न ही कभी भर पाएंगे।
तीन वर्ष पूर्व सात अगस्त 2009 को बाद फटने के बाद मूसलाधार बारिश से दाफा ग्राम पंचायत की बांजानी पहाड़ी दरकनी शुरू हुई। रात के ढाई बजे गहरी नींद में सोए ला, झेकला, बेड़ूमहर गांव के 43 लोगों को मलबे के ढेर ने हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर दिया। ला तथा झेकला जहां कभी आबादी बसती थी, लोग खेतों में काम कर, पशुओं को पाल अपनी आजीविका चलाते थे, आंगन में खेलते बच्चे उस इलाके की रौनक बढ़ाते थे, आज वही गांवों कब्रगाह के रूप में नजर आते हैं। डेढ़ किलोमीटर के दायरे में तब श्मशान बन चुके इस इलाके में मलबे के ऊपर अब हरी घास उग आई है। दोनों गांव जिले के नक्शे से ओझल हो गए। इस घटना के बाद सरकार की ओर से बड़े-बड़े दावे हुए, मगर प्राकृतिक कहर से जीवित बचे लोगों की माली हालत इन दावों को आज भी ठेंगा दिखा रही है।
सबसे दुर्भाग्य यह रहा कि 43 में से सिर्फ 28 शव ही मलबे के ढेर से निकाले जा सके। बाकी लाशें उसी मलबे में दफन रहीं। सरकार ने मृतकों के परिजनों को एक-एक लाख के हिसाब से राहत के तौर पर 43 लाख रुपये बांटे और खतरे से घिरे परिवारों को दूसरी जगह बसाने की भी बात की थी, मगर ला, झेकला के आधा दर्जन से अधिक परिवार 2012 की बारिश में भी दहशत के बीच अपनी जिंदगी उसी खतरे में बिता रहे हैं, जहां प्रकृति ने 43 लोगों को लील लिया था। प्रकृति की मार सहने वाले इन परिवारों की मदद के लिए सरकार कोई कदम उठाएगी, यह तो वक्त ही बताएगा, पर जो भी हो सात अगस्त का वह काला दिन कम से कम इस जिले के लोग कभी नहीं भुला पाएंगे।

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