मलबे में दबा दी पौराणिक विरासत

Pauri Updated Mon, 01 Dec 2014 05:30 AM IST
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श्रीनगर। प्रशासन की उदासीनता से शहर की पौराणिक विरासत मलबे में दफन हो गई है। जी हां बात हो रही है कशोराय मठ की। केशोराय मठ के ऐतिहासिक नक्काशीदार पत्थरों को जेसीबी से तोड़कर सुरक्षा दीवार निर्माण में मलबे के रूप में दबाया जा रहा है। माना जाता है कि 16 सदी में निर्मित यह मठ आदिगुरु शंकाराचार्य ने स्थापति किया था।
पिछले वर्ष जून माह की आपदा में अलकनंदा किनारे स्थित पौराणिक मंदिर केशोराय मठ ध्वस्त हो गया था। मंदिर का मलबा एक वर्ष से नदी किनारे पड़ा रहा। मंदिर नक्काशी युक्त पत्थरों से बना हुआ था। स्थानीय निवासियों व क्षेत्र के साहित्यकार लंबे समय से मंदिर के मलबे को संरक्षित करने की मांग कर रहे थे, लेकिन प्रशासन ने कभी इसे गंभीरता से नहीं लिया। मंदिर का अधिकांश हिस्सा नदी में बह गया। अब नक्काशीदार पत्थरों को सुरक्षा दीवार निर्माण में मलबे के रूप में दबाया जा रहा है। साहित्यकार व पूर्व पालिका अध्यक्ष कृष्णानंद मैठाणी ने कहा कि पौराणिक मंदिर के ऐतिहासिक नक्काशीदार पत्थरों व अन्य सामग्री को मलबे में दबाया जाना दुर्र्भाग्यपूर्ण है। इसकी जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि पूर्व में एनडीए सरकार को मंदिर के सुंदरीकरण के लिए उन्हाेंने 70 लाख का प्रस्ताव बना कर भेजा था। एसडीएम रजा अब्बास का कहना है कि मठ के नक्काशीदार पत्थरों को मलबे से अलग कर दिया जाएगा।

क्या है मंदिर की पौराणि स्थिति
मान्यता के अनुसार आदिगुरु शंकराचार्य ने 365 मठों का निर्माण किया था। केशोराय मठ उनमें से एक है। माना जाता है कि मंदिर का पुराना नाम आदि गुरु शंकराचार्य मठ था। बाद में इसका नामकरण मठ के पहले महंत केशोराय के नाम पर किया गया। इतिहासकारों के अनुसार मंदिर का निर्माण 1625 ई. में हुआ, लेकिन इसकी निर्माण शैली 7वी शताब्दी के पंरपरा में निर्मित मठों एवं मंदिरों की दिखती है। योजना, आर्किटेक्ट की दृष्टि से मठ का शिखर, विशाल मंडल आकर्षक और सुंदर थे। यह मठ करीब 388 वर्ष पूर्व निर्मित हुआ था। जबकि इतनी विशिष्ठताओं वाले 100 वर्ष पुराने स्थल भी पुरातात्विक महत्व के होते हैं।

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