बंदरों ने किया जीना मुहाल

Pauri Updated Tue, 21 Jan 2014 05:48 AM IST
कोटद्वार। द्वारीखाल ब्लाक के बांघाट क्षेत्र स्थित शीला गांव के निवासी अनसूया प्रसाद काला समेत आसपास के गांवों के लोग बंदरों के आतंक से निजात दिलाने के लिए हर सरकारी दफ्तर का चक्कर काटकर थक चुके हैं, मगर उनकी कहीं सुनवाई नहीं हो रही। ग्रामीणों का कहना है कि जल्द ही बंदरों की रोकथाम नहीं की गई तो लोगों का गांवों में टिका रहना ही मुश्किल हो जाएगा।
शीला के अनसूया प्रसाद ही नहीं, यहां के सुरेंद्र काला, चंद्रमोहन काला, विजय डोभाल, सुभाष डोभाल, हरीश और प्रकाश चंद्र भी बंदरों के आतंक से निजात दिलाने के लिए हर मंच पर गुहार लगा चुके हैं। उनका कहना है कि बंदरों के आतंक के सामने गांव की बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दे भी गौण हो गए। हालात यह है कि ग्रामीण सामूहिक रूप से पलायन करने तक की सोचने लगे हैं, मगर आर्थिक हालात इसकी इजाजत नहीं देते।
एपी काला गांव की व्यथा बताते हुए कहते हैं कि घर अकेला नहीं छोड़ सकते। खेती में जो बोते हैं, वह तहस-नहस कर देते हैं। बच्चों को स्कूल अकेले नहीं भेज सकते। गलती से घर का दरवाजा खुला रह गया तो बंदरों के झुंड के झुंड अंदर घुसकर राशन और सामान उठा ले जा रहे हैं। अब तक कई बच्चे और बुजुर्ग उनके हमले में घायल होकर इलाज करवा चुके हैं।
ग्रामीण बताते हैं कि ये बंदर इतने हिंसक हैं कि लोगों से नहीं डरते, बल्कि हमला करते हैं। पहले के बंदर ऐसे नहीं थे। उनका कहना है कि यूपी और उत्तराखंड के शहरों से पकडे़ गए ये बंदर पहाड़ के जंगलों में छोडे़ गए हैं। आसपास के गांव चमोली, बूंग, कंदरोड़ा, बिलखेत, बडेल, पाटली और कोटली में भी कमोबेश यही हाल है। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि उनके पास ऐसी कोई योजना नहीं है कि बंदरों को पकड़कर कहीं और छोड़ा जाए।
डीएफओ नेहा वर्मा का मानना है कि जंगलों में भोजन और पानी की कमी के चलते बंदर आबादी का रुख करने लगे हैं। यह हर क्षेत्र और गांव की समस्या बन रही है। सभी जगह के बंदर पकड़ना संभव नहीं है।

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