कालागढ़ मार्ग पर सख्ती शुरू

Pauri Updated Mon, 20 Jan 2014 05:48 AM IST
कोटद्वार। कालागढ़ टाइगर रिजर्व (सीटीआर) के अंतर्गत पड़ने वाले कोटद्वार-कालागढ़ मार्ग पर निजी वाहनों से आवाजाही करना अब आसान नहीं रह गया है। वन विभाग इस मार्ग पर लोगों की आवाजाही पर शिकंजा कसने लगा है। इस साल से मार्ग पर आवाजाही के लिए वन अधिकारियों से पूर्व में अनुमति लेना जरूरी कर दिया गया है। बगैर अनुमति इस सड़क का उपयोग करने वालों को पाखरों से बैरंग लौटाया जा रहा है। यही नहीं उन पर वन एवं वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है। सीटीआर के नए फरमान से स्थानीय लोगों का परेशान होना स्वाभाविक है।
पृथक उत्तराखंड राज्य बनने के बाद जहां लोगों को गढ़वाल और कुमाऊं को जोड़ने वाले कोटद्वार-कालागढ़-रामनगर मार्ग के पक्का बनने की उम्मीद जगी थी, वहीं वन विभाग वन मोटर मार्गों को पक्का बनाना तो दूर इस पर रही सही आवाजाही पर भी शिकंजा कसने लगा है। विभाग ने एक जनवरी से इस मार्ग पर बिना अनुमति के आवाजाही पर सख्ती से प्रतिबंध लगा दिया है। सीटीआर के एसीएफ एसपी सिंह की मानें तो ऐसा वन्यजीवों की सुरक्षा को देखते हुए किया गया है। उनका कहना है कि कालागढ़ मार्ग वन मोटर मार्ग है सार्वजनिक मार्ग नहीं। इस पर आवाजाही के लिए लोगों को विभाग को औचित्यपूर्ण कारण बताना होगा। मार्ग पर जाने के लिए रेंज अधिकारियों या उपप्रभागीय कार्यालय से अनुमति प्राप्त करना जरूरी कर दिया गया है।

शार्टकट अपना रहे थे लोग
वन अधिकारियों की मानें तो कोटद्वार से लोग यूपी जाने के लिए इस मार्ग को शार्टकट के रूप में अपना रहे थे। आगे जाकर लोग जंगल में प्रवेश कर जाते थे। इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए मार्ग पर सामान्य आवाजाही प्रतिबंधित कर दी गई है। अनुमति न लेने वालों को अभी पाखरों गेट से बैरंग लौटाया जा रहा है।

पटवारी सर्किल सनेह में पड़ता है पूरा एरिया
वन विभाग के नए फरमान से क्षेत्रवासियों में आक्रोश है। कोटद्वार निवासी विजयपाल सिंह रावत, चंडीप्रसाद कुकरेती, भाजपा जिलाध्यक्ष धीरेंद्र चौहान का कहना है कि कांग्रेस शासनकाल में आम जनता पर वन विभाग के कायदे कानून थोपे जा रहे हैं, जिस मार्ग पर लोग आवाजाही करते थे, उस पर जाने के लिए लोगों को दस दिन पहले परमिशन लेनी होगी। परमिशन के लिए उन्हें वन विभाग के दफ्तरों के चक्कर काटने होंगे। प्रवीन पुरोहित का कहना है कि सनेह से लेकर कालागढ़ तक का एरिया एक ही पटवारी सर्किल में पड़ता है, लोग हर रोज अपनी नाते रिश्तेदारी में आते जाते रहते हैं। सीटीआर बनने के बाद मुश्किलें बढ़ गई हैं। उनका कहना है कि अब कोटड़ी और दुगड्डा रेंजों को भी सीटीआर में मिलाने के प्रस्ताव पर विचार चल रहा है।

अब चिलरखाल-लालढांग मार्ग का भी नंबर
लैंसडौन वन प्रभाग के कोटद्वार और लालढांग रेंज को भी अब प्रस्तावित राजाजी टाइगर रिजर्व में शामिल करने का प्रस्ताव चल रहा है। टाइगर रिजर्व में शामिल होते ही इन क्षेत्रों पर भी शिकंजा कसने की आशंकाएं बनी है। लोगों का कहना है कि क्षेत्र की लाइफ लाइन चिलरखाल-लालढांग मार्ग पर भी शिकंजा कसा तो राज्य के पास अपनी सड़क रह ही नहीं जाएगी। डीएफओ नेहा वर्मा का कहना है कि चिलरखाल-लालढांग मार्ग सार्वजनिक मार्ग नहीं है। वन एवं वन्यजीवों की बहुलता और उनके संरक्षण के चलते व्यावसायिक वाहनों पर प्रतिबंध लगाया गया है।

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