पलायन में झलका पहाड़ का दर्द

Pauri Updated Wed, 30 Jan 2013 05:30 AM IST
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कोटद्वार। मालवीय उद्यान में चल रहे तीन दिवसीय नाट्य महोत्सव के तीसरे और अंतिम दिन तीन नाटकों का मंचन किया गया। पलायन पर चोट करते अनुसुया प्रसाद डंगवाल के नाटक पालायन ने खूब वाह वाही लूटी। साथ ही डंगवाल के दो कविता संग्रहों का भी इस मौके पर विमोचन किया गया।
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पलायन पर चोट करते नाटक में दिखाया गया कि किस तरह से लोग पहाड़ों से पलायन कर रहे हैं। दिनों दिन खाली होते गांव और वीरान होते पहाड़ों के दर्द को देखकर दर्शक गहरी सोच में डूब गए। इसमें गढ़वाल के प्रसिद्ध हास्य कलाकार किसना बगोट के अभिनय ने लोगों को काफी प्रभावित किया। कार्यक्रम की शुरूआत भष्मासुर गीत नाटिका से हुई। इसके बाद सत्यवान सवित्री नाटक ने लोगों को भावुक कर दिया। इससे पहले स्वास्थ्य मंत्री के जन संपर्क अधिकारी दर्शन सिंह रावत ने डंगवाल के गढ़वाली कविता संग्रह उमाल और हिन्दी कविता संग्रह अंतर्द्वद का विमोचन किया। गढ़वाली कविता संग्रह उमाल में समाज में होनी वाली घटनाओं पर कटाक्ष किया। वहीं हिन्दी कविता संग्रह में युवा पीढ़ी पर कई तंज कसे हैं। इसमें पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रंगे युवाओं की दशा और उनकी जीवन शैली पर व्यंग्य किए हैं। साथ ही युवाओं को समाज के लिए कुछ करने और अच्छी शिक्षा ग्रहण करने को भी प्रेरित किया गया है। कार्यक्रम का संचालन सुधीर बहुगुणा ने किया। इस मौके पर कई जाने माने रंगकर्मी मौजूद रहे।


हैडिंग
बदलते जमाने में फीके पड़ गए थिएटर के रंग
42 सालों में धर्मशाला से मालवीय उद्यान तक पहुंच पाया थिएटर
तब दस पैसे में देखने को मिलता था नाटक
अब मुफ्त में भी नहीं जुट पा रहे दर्शक
अमर उजाला ब्यूरो
कोटद्वार। थिएटर और कोटद्वार दोनों का पुराना नाता है। बदलते जमाने के साथ नाटकों की दुनिया में यहां भी बहुत कुछ बदला। नाटकों की दुनिया ने कई बदलाव और उतार चढ़ाव देखे। कई नए कलाकार जुडे, नाटकों ने सफलता की बुलंदियां भी देखी। 1970 के दशक में नाटक देखने के लिए 10 पैसे खर्च करने पडते थे तब मनोरंजन के साधन कम थे, दर्शकों की भारी भीड़ जुटती थी लेकिन जमाने की चकाचौंध में जैसे-जैसे मनोरंजन के संसाधन बढ़े नाटकों की दुनिया विरानी होती गई। आज हालात यह है कि बिना टिकट के चल रहे नाटकों में भी दर्शक नहीं जुट पा रहे हैं। कलाकारों की माली हालत में भी सुधार नहीं हुआ। सरकार की ओर से संरक्षण न मिलने के कारण कोटद्वार में थिएटर के दिन नहीं बहुर सके।

एक अदद ऑडिटोरियम की दरकार
1970-71 में शहर में हिन्दू पंचायती धर्मशाला में गढ़वाल नवयुवक सांस्कृतिक संघ के कार्यकर्ता नाटक का मंचन करते थे। शहर में यही एक मात्र सार्वजनिक स्थान था। तब कलाकार चंदा जमा कर नाटक पर खर्च होने वाली धनराशि जुटाया करते थे। दर्शकों से 10 पैसे लिए जाते थे। 11 पैसे मनोरंजन कर भी देना पड़ता था। अब मालवीय उद्यान में नाटकों का मंचन किया जा रहा है। इस लंबे अरसे में भी शहर को एक तदद ऑडिटोरियम तक नहीं मिल पाया। कुछ सालों पहले उस समय कलाकारों की उम्मीदें जगी थी, जब बद्रीनाथ मार्ग पर आडिटोरियम बनाने की स्वीकृति मिली थी। लेकिन उसका काम अधूरा लटका पड़ा है।

नहीं मिलती थी महिला पात्र
उस समय महिला पात्रों का किरदार भी पुरुष ही निभाते थे। महिलाओं को नाटकों में किरदार निभाना गलत माना जाता था। महिलाओं का मजाक उड़ाया जाता था। जानकार बताते हैं कि कोटद्वार में पहली बार उस समय यहां तैनात डॉक्टर की दो बेटियों गायत्री और विशेश्वरी ने महिला किरदार निभाए थे।

क्या कहते हैं कलाकार
- कलाकारों के लिए कुछ खास नहीं हो पाया है। स्थानीय स्तर पर सुविधाओं का अभाव है। इससे संस्कृति का हृस हो रहा है। - अनुसुया प्रसाद डंगवाल, रंगकर्मी और अध्यक्ष रैबार नाट्य कला समिति।

-यहां आडिटोरियम की काफी जरूरत है। लेकिन सरकार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। जिससे कलाकारों का उत्साह काम हो रहा है। उनको मंच नहीं मिल पाता है। - ओम प्रकाश कपटियाल, रंगकर्मी।

-प्रतिभाओं की कमी नहीं है। लेकिन उन्हें संवारने और मंच देने की जरुरत है। क्षेत्रीय प्रतिनिधियों को कलाकारों पर ध्यान देना चाहिए। जिससे कलाकारों को मंच मिल सके। - रामरतन काला, तत्कालीन गढ़वाली गायक और रंग कर्मी।

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