बता बौराणी तेरू क्या नौं च.....

Pauri Updated Tue, 29 Jan 2013 05:30 AM IST
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कोटद्वार। बता बौराणी तेरू क्या नौं च.......सेठू की ब्वारी पाली गांव च, रामी बौराणी गीत नाटिका की एक एक लाइन लोगों को भावुक कर गई। नाट्य आयोजन के दूसरे दिन रामी बौराणी गीत नाटिका का मंचन किया गया। नाटक के मंचन के दौरान कई लोगों की आंखों में आंसू छलक आए।
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मालवीय उद्यान में चल रहे तीन दिवसीय नाट्य महोत्सव में जहां एक ओर कौथिगैर संस्था के रामी बौराणी ने लोगों को रुलाया, वहीं उपासना संस्था के खाड़ू लापता ने सभी को हंसने पर मजबूर कर दिया। वियोग पर आधारित रामी बौराणी गीत नाटिका ने दर्शकों को अपनी जगहों पर बैठे रहने को मजबूर कर दिया। बौड़ी-बौड़ी ऐगी ब्वारी पुस कु मैन, गांव की बेटी ब्वारी मैत चली गैन गीत के साथ शुरू हुए नाटक ने लोगों को भावुक कर दिया। रामी खेत में काम कर रही होती है। इस बीच वहां साधू वेश में उसका पति 12 साल बाद घर आ कर उसे तंग करने लगता है। इस पर रामी साधू को अपने पति धर्म का हवाला देते हुए उसे दूर रहने को कहती है। रामी के विरोध करने के बाद साधू उसके घर पहुंच जाता है और भोजन मांगता है, लेकिन रामी साधू को ढोंगी बता कर भोजन देने से मना कर देती है। नाटिका के अंत में साधू वेश में आए 12 साल पहले बिछड़े पति को सैनिक की वर्दी पहने देख कर रामी खुशी के मारे रोने लगती है। रामी का किरदार निभा रही पूजा काला ने अपने अभिनय से सभी को प्रभावित किया। दूसरी ओर खाड़ू ला पता हास्य नाटक ने लोगों को खूब गुदगुदाया। नाटक गांव से गायब हुए एक खाड़ू पर आधारित है। पूरी कहानी इसी के इर्द गिर्द घूमती है। मंगसीरू का किरदार निभा रहे रवींद्र कुमार सहित सभी कलाकारों ने अपनी छाप छोड़ी। कार्यक्रम का उद्घाटन नगर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष संजय मित्तल ने किया। इस मौके पर रैबार संस्था के अध्यक्ष अनुसुया प्रसाद डंगवाल, गिरिराज किशोर हिंदवाण, प्रकाश गढ़वाली, राम रतन काला, ओम प्रकाश, रणवीर सिंह चौहान और पारेश्वर प्रसाद निर्मोही सहित कई लोग मौजूद रहे।


1901 में लिखा गया था रामी बोराणी
-बलदेव प्रसाद दीन ने रामी बौराणी नाटक 1901 में लिखा था। तब से इस नाटक को कई मंचों में प्रदर्शित किया गया। इसे अलग-अलग मंचों पर अलग कलाकारों ने दिखाया। लेकिन नाटक की ताजगी 112 सालों बाद भी पहले जैसे ही बनी हुई है।

न्यूयार्क में लिखा गया खाडू ला पता
खाड़ू लापता नाटक को ललित मोहन थपलियाल ने लिखा था। इसकी खास बात यह है कि यह उन्होंने न्यूयार्क में 1951 में लिखा था। तब से लेकर आज तक इसका मंचन कई विदेशी मंचों सहित देश भर में हो चुका है।

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