प्रकृति को प्रकृति से संवारते हैं जयकृष्ण

Pauri Updated Mon, 05 Nov 2012 12:00 PM IST
श्रीनगर। पहाड़ सहन करता है बर्फ की मार, झरने की धार, धूप की तपिश, बारिश की बौछार, पतझड़ का उजाड़, नदियों की बाढ़। जयकृष्ण पैन्यूली न सिर्फ ऐसा अपनी कविताओं में लिखते हैं, बल्कि प्रकृति से ही प्रकृति के इन रूपों को संवारते भी हैं। उन्होंने मिट्टी, कोयला, फूल, फल, पत्तियों तथा राख के रंगों के प्रयोग से शानदार पेंटिंग्स भी बनाई हैं।
देश के विभिन्न हिस्सों में पड़ी मिट्टी की महक से अपने चित्रों और कल्पनाओं को रंगने वाले शिक्षक जयकृष्ण पैन्यूली की पेंटिंग बनाने की यात्रा भी रोचक है। मुख्य रूप से रसायन अध्यापक पैन्यूली को वर्ष 2009 में जब वे टिहरी जिले के जीआईसी घंडियालधार में थे, तो वहां कला अध्यापक न होने पर उन्हें यह विषय भी पढ़ाना पड़ा था। कला पढ़ाते हुए जब एक विद्यार्थी से ड्राइंग बुक लाने को कहा, तो वह रोने लगा। तब कुछ और बच्चों से उन्हें मालूम हुआ कि वह बेहद गरीब है। ड्राइंग बुक के लिए उसके पास पैसे नहीं हैं। वे उस विद्यार्थी के लिए ड्राइंग बुक खरीदकर लाए और बोले- बेटा मिट्टी में कई रंग हैं, इनसे भी चित्रों में रंग भरा जा सकता है।
इस दिशा में उन्होंने स्वयं काम करना शुरू किया। इसके बाद तो कई साहित्य सम्मेलनों में लखनऊ, गोआ, इलाहाबाद, ग्वालियर, आगरा, दिल्ली तथा प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में अपनी प्रस्तुतियां देने गए जयकृष्ण पैन्यूली ने मिट्टी एकत्रित की और अब तक 40 पेंटिग्स बना चुके हैं। जड़ों की मासूमियत, जमीं पर परिंदा, एकता में शक्ति, मातृत्व, आलिंगन सहित कई पोर्टेट सहित बनाई गई इन पेंटिग्स की प्रदर्शनियों की खूब सराहना हुई है। राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव में भी उनकी प्रदर्शनी को कई स्थानों से आए कलाकारों ने भी सराहा। वे कहते हैं कि अपने अनुभव को मैं पहाड़ के बच्चों के साथ बांटना चाहता हूं।

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योगेंद्र के रेखाचित्र भी लुभा रहे मन
श्रीनगर। राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव में लगे योगेंद्र कांडपाल के रेखाचित्रों की चर्चा भी दर्शकों के बीच है। आड़ी-तिरछी रेखाओं से बने ये रेखाचित्र विशेष रूप से स्त्री विमर्श, संयोग व वियोग श्रृंगार तथा प्रकृति की चीत्कार को दर्शाते हैं। वे कहते हैं कि बी मोहन नेगी उनकी प्रेरणा के स्रोत हैं।

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