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एलबम में भी गूंजेगा गैरसैंण-गैर क्यों

Pauri Updated Sun, 16 Sep 2012 12:00 PM IST
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कोटद्वार। आम पर्वतीय जनमानस के मन में गैरसैंण के गैर होने की पीड़ा लंबे समय से है। मगर अब यह भाव एक उत्तराखंडी एलबम में भी गूंजेगा। गैर क्यों-गैरसैंण नाम से जल्द ही एक उत्तराखंडी एलबम बाजार में आने जा रही है। इसके गीतों की रिकार्डिंग कर ली गई है। अक्तूबर में इस एलबम को लांच किया जा रहा है। दो अक्तूबर को गैरसैंण में कैबिनेट बैठक का सरकार ने भी निर्णय लिया है।
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गैर क्यों-गैरसैंण एलबम में आठ गीतों को शामिल किया गया है। इस एलबम को लोक गायक मुकेश कठैत और लोक गायिका रंजना बक्शी ने तैयार किया है। कठैत ने बताया कि उत्तराखंड बनने के बावजूद राजधानी गैरसैंण में नहीं बन पाई है। यह स्थान आज भी उपेक्षित है। इसको लेकर उनके मन में काफी पीड़ा थी। इसी लिए इस एलबम के मार्फत प्रयास किया गया है। रॉकवैल म्यूजिक कंपनी के बैनर तले बन रहे म्यूजिक एल्बम गैर क्यों? गैरसैण के सारे गीतों को उन्होंने गायिका रंजना बक्शी के साथ गाया है। संगीत मोती शाह ने दिया है। गीतों के रिकार्डिंग इंजीनियर सोनू गुसाईं ने की। रॉकवैल कंपनी के सहयोगी आरपी बक्शी और संयोजक राजीव सक्सेना के अनुसार इन गीतों के माध्यम से गैरसैंण के मुद्दे को गरमाने की कोशिश की जाएगी। एलबम में श्रीनगर डैम, अमीर गरीब के बढ़ते फासले, गंगा भजन (पांच प्रयाग), मायके की खुद (मैत्यूं का), अमरा-बिजोरा-बांद पर फोकस करते हुए भी गीत शामिल किए गए हैं। रॉकवैल कंपनी की निर्मात्री रंजना बक्शी के अनुसार इसमें एक गीत पहाड़ी बोली भाषा के दूत लोक गायकों और लोक कलाकारों की पीड़ा पर भी आधारित है। इसमे वर्तमान में मंदी की मार झेल रहे सीडी व्यापार और लोक कलाकारों की पीड़ा को बखूबी उकेरा गया है। सोची निछौ-गीत के माध्यम से संस्कृति संस्कृति बचाने का आह्वान भी किया गया है।


उत्तराखंडी गीतों में छाया रहा है गैरसैंण
गैरसैंण का मुद्दा उत्तराखंडी गीतों में छाया रहा है। कई लोक गायकों ने अपने एलबमों में इस मुद्दे को प्रमुखता से लिया है। प्रख्यात लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी के लोकप्रिय गीत-सब्बी धाणी देहरादूण, हूणी खाणी देहरादूण में भी गैरसैंण का मुद्दा उठा है। गीत की यह लाइन काफी पसंद की गई थीं-हमन बोली गैरसैंण, ऊन सूणी देहरादूण।

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