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जब इंदिरा बनाम पहाड़ हो गया था चुनावी समर

Dehradun Bureauदेहरादून ब्यूरो Updated Sun, 17 Mar 2019 10:02 PM IST
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पौड़ी। लोकसभा चुनाव-2019 के चुनावी समर का आगाज हो गया है। राजनीतिक दलों में वार-पलटवार का दौर भी तेज होता जा रहा है। उत्तराखंड की संसदीय राजनीति में गढ़वाल संसदीय सीट सबसे हॉट सीट है। संसदीय चुनावों के इतिहास में यह सीट वर्ष 1982 में दुनिया की नजरों का केंद्र बन गई थी। इसकी स्मृति आज भी पहाड़ के मतदाताओं में सिहरन व कौतूहल पैदा करती है। दुनिया ने इस चुनाव में सत्ता का दुरुपयोग भी देखा तो मतदाता की ताकत का अहसास भी गढ़वाल सीट ने ही दुनिया को कराया।
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वर्ष 1980 में लोकसभा चुनाव संपन्न हुए। केंद्रीय मंत्रिमंडल का गठन हुआ, लेकिन इससे पहले ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी व गढ़वाल सांसद हेमवती नंदन बहुगुणा के बीच अनबन शुरू हो गई। तत्कालीन राजनीति की नैतिकता का स्तर इतना ऊंचा था कि हेमवती नंदन बहुगुणा ने इंदिरा गांधी से नाराजगी के चलते कांग्रेस पार्टी के साथ ही संसद सदस्य के पद से भी इस्तीफा दे दिया। इससे गढ़वाल लोकसभा सीट खाली हो गई। इस सीट पर वर्ष 1981 में उपचुनाव हुआ, लेकिन जिलाधिकारी गढ़वाल की एक रिपोर्ट पर निर्वाचन आयोग ने चुनाव रद्द कर दिया। गढ़वाल सीट पर दोबारा वर्ष 1982 को उपचुनाव हुआ। इसमें तत्कालीन केंद्र सरकार ने जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी। इससे पहली बार संसदीय चुनाव के इतिहास में यह सीट दुनिया की नजरों में आ गई। उपचुनाव पूरी तरह इंदिरा बनाम पहाड़ हो गया। इसमें मतदाता की ताकत के आगे सत्ता का दुरुपयोग हार गया। निर्दलीय प्रत्याशी हेमवती नंदन बहुगुणा भारी मतों से कांग्रेस प्रत्याशी चंद्रमोहन सिंह नेगी से जीत गए। जनपद पौड़ी के बुघाणी गांव में 25 अप्रैल 1919 को जन्मे हेमवती नंदन बहुगुणा ने 17 मार्च 1989 को अंतिम सांस ली। हेमवती नंदन बहुगुणा के सारथी रहे राजनीतिक विश्लेषक कृष्णानंद मैठाणी बताते हैं कि बहुगुणा जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। पूरे देश में जेपी का समग्र क्रांति आंदोलन चरम पर था, लेकिन बहुगुणा के राजनीतिक चातुर्य ने उत्तर प्रदेश में जेपी के आंदोलन को यह कहकर शिथिल कर दिया कि जेपी उत्तर प्रदेश के राज्य अतिथि होंगे। जेपी के कानपुर पहुंचते ही वे उनसे मिलने चले गए। उनका यह कदम इंदिरा को खटक गया। उन्होंने बताया कि इंदिरा से बहुगुणा की अनबन लगातार बढ़ती चली गई, जो आम चुनाव 1980 के बाद बहुगुणा के पार्टी व संसद सदस्यता से त्यागपत्र के बाद देश की राजनीति को एक नई दिशा में ले गया। वर्ष 1982 के उपचुनाव को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार डा. योगेश धस्माना बताते हैं कि 1982 के उपचुनाव में पहाड़ ने सत्ता का दुरुपयोग नजदीक से देखा। गढ़वाल सीट छावनी में तब्दील हो गई थी। देश के विभिन्न राज्यों के छह मुख्यमंत्री, पूरा केंद्रीय मंत्रिमंडल चुनाव मैदान में कूद गया था। उन्होंने बताया कि परंपरा को तोड़ते हुए अकेले प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 38 जनसभाएं की थीं। डा. धस्माना ने बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी, तारकेश्वरी सिन्हा पटना, राजनारायण रायबरेली, सीपीआई से इंद्रजीत गुप्त और हरिकेश बहादुर गोरखपुर के सांसद ने बहुगुणा का साथ दिया।

बहुगुणा का यादगार भाषण
पौड़ी। वर्ष 1982 के उपचुनाव में हेमवती नंदन बहुगुणा ने यादगार भाषण दिया। उन्होंने कहा कि इंदिरा मुझे जीतने नहीं देगी। गढ़वाल की जनता मुझे हारने नहीं देगी। उनका यह बयान पहाड़ की पूरी राजनीति की दिशा को ही बदल गया।

पहली बार रद्द हुआ चुनाव
पौड़ी। गढ़वाल संसदीय सीट वर्ष 1980 में बहुगुणा के त्यागपत्र से खाली हो गई थी। जिस पर वर्ष 1981 में उपचुनाव हुआ। तत्कालीन जिलाधिकारी गढ़वाल बीपी पांडे ने आयोग को भेजी रिपोर्ट में कहा कि हरियाणा पुलिस कहां से आई, किसने भेजी, क्यों नियुक्त हुई, मुझे इसकी कोई जानकारी ही नहीं है। जिलाधिकारी गढ़वाल की इस रिपोर्ट पर मुख्य चुनाव आयुक्त श्यामलाल सकधर ने चुनाव रद्द घोषित कर दिया।

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