झाड़ियों से पटी है टैगोर की विरासत

Nainital Updated Tue, 26 Nov 2013 05:47 AM IST
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‘साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए रविंद्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार दिया गया था। इसके सौ साल पिछले बुधवार को पूरे हो गए हैं। इस अवसर पर टैगोर के जीवन से जुड़े आयोजन स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में हो रहे हैं।’
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भीमताल। महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर को उनकी कृति ‘गीतांजलि’ के लिए साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार मिला था। 100 वर्ष पहले नोबेल प्राप्त करने वाले टैगोर पहले भारतीय थे, मगर यह कम लोगों को मालूम होगा कि गीतांजलि का एक बड़ा भाग उन्होंने रामगढ़ की शांत वादियों में लिखा था। जिस जगह वह इस कृति को लिखने बैठते थे, वही ऐतिहासिक विरासत आज खंडहर में बदल गई है। सरकार और प्रशासन ने इस महान साहित्यकार की विरासत को भुला दिया है। स्थिति यह है कि कुछ विरासतें मिट रही हैं और कुछ को हम मिटा रहे हैं।
वर्ष 1900 में टैगोर पहली बार अपने दोस्तों संग रामगढ़ आए थे। यहां की प्राकृतिक सुंदरता से वह इतने प्रभावित हुए कि सालभर बाद उन्होंने डेरियाज नामक अंग्रेज से लगभग 40 एकड़ जमीन खरीदकर रामगढ़ में भवन बनवाया। इसका नाम उन्होंने अपनी बेटी हेमंती के नाम पर हेमंती गार्डन रखा। तब क्षेत्र के संभ्रांत व्यक्तियों दीवान सिंह, सरपंच बच्ची सिंह, मोहन सिंह ढैला, चंदन सिंह दरम्वाल, मोतीराम पांडे और बहादुर सिंह ढैला से वो विकास, साहित्य की चर्चा भी करते रहते थे। 1901 से 1905 तक टैगोर रामगढ़ रहे। गीतांजलि की कल्पना और उसकी रचना में यहां के प्रवास का बड़ा योगदान रहा। माना जाता है कि उन्होंने इस कृति के कुछ अध्याय यहीं लिखे।
उन्होंने रामगढ़ प्रवास के दौरान महादेवी वर्मा को यहां के प्राकृतिक स्वरूप के बारे में बताया था और यहीं बसने की सलाह दी, लेकिन इसी दौरान बहन का स्वास्थ्य बिगड़ गया तो वह उसे इलाज के लिए लखनऊ ले गए। जहां उनकी बेटी की मौत हो गई। इसके बाद टैगोर फिर रामगढ़ नहीं लौटे। बाद में उन्होंने बंगाल में शांति निकेतन खोल रामगढ़ की भूमि राजा अजयगढ़ को बेच दी। कभी टैगोर के मैनेजर रहे स्व. टीकम सिंह ढैला के नाती महेंद्र ढैला बताते हैं कि अजयगढ़ ने ये भूमि सिंधिया परिवार को बेची। इसी के बाद से रामगढ़ की इस पहाड़ी टैगोर टाप के नाम से जाना जाता है। आज टैगोर टाप जंगल के भीतर छुपा एक बदतर खंडहर भर है और भूमि वन विभाग के अधीन है। इतिहास को संजोने के बजाय हमारी सरकार ने इसके अवशेष तक मिटने के लिए छोड़ दिए हैं।
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साहित्यकार सीएम निशंक की घोषणा भी बेकार गई
भीमताल। 17 अगस्त 2000 को तत्कालीन संस्कृति एवं धर्मस्व मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने टैगोर टाप में संग्रहालय की स्थापना, संपर्क मार्ग निर्माण और सौंदर्यीकरण के लिए 50 लाख रुपये देने की घोषणा की थी। आरईएस को पहली किश्त में 22 लाख मिले तो संग्रहालय का काम शुरू कराया गया। लगभग 7 लाख रुपये खर्च हुए थे कि काम बंद हो गया। उसके बाद एक धेला नहीं मिला।
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टैगोर टॉप विकसित करने के लिए प्रस्ताव शासन को भेजने की बात मेरे संज्ञान में नहीं है। इस संबंध में विभागीय अधिकारियों से जानकारी ली जाएगी। -अरविंद सिंह ह्यांकी, डीएम नैनीताल।
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वन एक्ट के कारण काम न होने पर शेष 15 लाख रुपये शासन को वापस कर दिए गए। कुछ साल पहले रास्ते के लिए 4 लाख मिले थे लेकिन उद्यान विभाग से एनओसी नहीं मिलने से काम नहीं हो पाया। -पीएस बृजवाल, ईई, आरईएस नैनीताल।
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रामगढ़ क्षेत्र टैगोर जैसे विश्वकवि का स्थान रहा है। अगर यह किसी और देश में होता तो लोग मत्था टेकने आते। टैगोर टाप की उपेक्षा पर दु:ख होता है। कुछ ऐसी योजना हो, जिससे ये विरासत हमेशा लोगों की यादों में रहें। -प्रो. देव सिंह पोखरिया निदेशक महादेवी वर्मा साहित्य सृजन पीठ उमागढ़ (रामगढ़)।
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