जंगल ही नहीं धरोहर भी बचा रहा जंगलात

Nainital Updated Mon, 25 Nov 2013 05:45 AM IST
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हल्द्वानी। जंगलात केवल वन ही नहीं बल्कि धरोहर भी बचा रहा है। 137 साल पहले वन संपदा की रक्षा के लिए वन महकमे ने चोरगलिया के घने जंगल में 1876 में रेस्ट हाउस बनाया था, जो आज भी जंगल की सुरक्षा में मददगार बन रहा है। इसके अलावा आंवलाखेड़ा जैसे घने और दुर्गम इलाके में भी 134 साल पहले सुरक्षा को चौकी बनाई थी, जो आज भी जंगल बचाने में मददगार बन रही है। जंगलात ने इनकी मरम्मत की, लेकिन इनके मूल स्वरूप को बनाए रखा। इसके अलावा कई ऐतिहासिक इमारतों को भी जंगलात ने संरक्षित करने के साथ मूलस्वरूप बनाए रखा है।
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जंगल बचाने के लिए प्रभागों की स्थापना हुई थी, उसमें सबसे पुराने प्रभागों में हल्द्वानी डिवीजन है। यह प्रभाग बाघ, हाथी के अलावा दूसरे वन्यजीवों और वन संपदा से भरपूर रहा है। इसकी सुरक्षा को 1876 में चोरगलिया में अंग्रेजों ने रेस्ट हाउस बनाया। यहां से नेपाल सीमा और दूरस्थ क्षेत्रों के जंगल की सुरक्षा होती थी। इसके बाद आंतरिक व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए 1879 में आंवलाखेड़ा में चौकी बनाई, जहां आज भी पहुंचना दुष्कर है। यहीं पर बाद में 1906 में दूसरे रेस्ट हाउस का भी निर्माण किया गया। बीहड़ कहे जाने वाले दुर्गापीपल जहां छह महीने रास्ता कटा रहता है, वहां पर भी 1916 में रेस्ट हाउस बनाया गया। इसी तरह जौलासाल में 1918 में रेस्ट हाउस का निर्माण किया गया। उप प्रभागीय वनाधिकारी प्रकाश आर्य कहते हैं कि यह रेस्ट हाउस, चौकियां सौ साल से ज्यादा वक्त की हैं, इन ऐतिहासिक भवनों का इस्तेमाल आज भी सफलतापूर्वक जंगल बचाने में किया जा रहा है। जंगलात को अगर मरम्मत भी करनी होती है, तो उसके मूलस्वरूप से कोई भी बदलाव नहीं किया जाता है। इसी तरह तिकोनिया, पवलगढ़, नंधौर, किशनपुर और किलबरी के रेस्ट हाउस भी ऐतिहासिक है।
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