बीमार व्यवस्था में मरने को मजबूर मरीज

Nainital Updated Thu, 21 Nov 2013 05:45 AM IST
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हल्द्वानी। शासन-प्रशासन की बेरुखी से अब मरीज टूटने लगे है। महीने भर से अधिक समय से चल रही लैब टैक्नीशियनों की हड़ताल से मरीजों की ही कमर नहीं टूटी सरकार को लाखों रुपये का चूना लग चुका है। सरकारी अस्पतालों में जो जांचें मुफ्त में होती थी उसके लिए रोगियों को हजारों रुपये फूंकने पड़ रहे हैं। इतना समय बीतने के बावजूद शासन-प्रशासन कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं कर पाया है।
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प्रदेशभर में करीब 52 सरकारी लैबें हैं, जहां मरीजों की सस्तों दरों के अलावा मुफ्त में भी जांचें होती हैं। कुमाऊं की करीब 19 लैबें इसमें शामिल है। 17 अक्तूबर से लैब टैक्नीशियनों की हड़ताल के कारण जांच का काम ठप पड़ा है। राहत की बात यह है कि 12 नवंबर से इमरजेंसी सेवाएं शुरू हो गई हैं। हड़ताल के कारण मुफ्त होने वाली गर्भवती महिलाओं की जांच के अलावा मलेरिया, डेंगू और बीपीएल मरीजों को भी जांच के लिए निजी पैथ लैबों की शरण में जाना पड़ रहा है। निजी पैथ लैबों में गर्भवती महिलाओं को एक बार की जांच के लिए 1600 से 1800 रुपये देने पड़ रहे हैं। जबकि मलेरिया के लिए 250-300, डेंगू के लिए 1200 रुपये तक देने पड़ रहे हैं। इसके अलावा सबसे बड़ा नुकसान बीपीएल मरीजों को उठाना पड़ा है। मरीजों के अलावा राजस्व का भी नुकसान हो रहा है। एक अनुमान के मुताबिक बेस अस्पताल हल्द्वानी में ही रोज करीब 150 लोगों की जांच होती थी। इससे करीब 10 हजार का प्रतिदिन राजस्व मिलता है। एक महीने से रोज करीब 10 हजार का नुकसान हो रहा है। जबकि रोगियों को निजी लैबों में इसके लिए चौगुनी कीमत चुकानी पड़ रही है। इसके बावजूद शासन-प्रशासन की तरफ से कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई है। हड़ताली कर्मचारियों का कहना है कि वेतन विसंगति की मांग को लेकर आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक आश्वासन के अनुरूप कैबिनेट में इस पर फैसला नहीं किया जाता।
बड़े अस्पतालों में हमने व्यवस्था की थी। गर्भवती महिलाओं के मामले में भी आदेश किए गए हैं कि निजी लैबों में दिखाया जाए। इसका शुल्क दिया जाएगा। जल्द हल निकालने की कोशिश की जा रही है। हल नहीं निकलता तो वैकल्पिक व्यवस्था होगी।
गौरीशंकर जोशी, डीजी हेल्थ
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