काम एक जैसा, वेतन अलग-अलग क्यों?

Nainital Updated Sat, 26 Oct 2013 05:44 AM IST
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हल्द्वानी। अनुसूचित जाति के स्कूलों के अध्यापकों ने सरकार और विभागीय अफसरों पर सवाल दागे हैं। उनका कहना है वे जनजाति स्कूलों के अध्यापकों की तरह पढ़ाते हैं तो वेतन अलग-अलग क्यों? सरकार जनजाति के स्कूलों के अध्यापकों को छठा वेतन के हिसाब से वेतन दे रही है, लेकिन अनुसूचित जाति के स्कूलों के अध्यापकों को छठा वेतनमान मिलना तो दूर, उन्हें समय पर वेतन भी नहीं मिल रहा है।
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संयुक्त निदेशक (समाज कल्याण) ब्रह्मपाल सिंह सैनी ने हाल ही में अनुसूचित जाति और जनजाति के स्कूलों की रिपोर्ट तैयार की, तब अनुसूचित जाति स्कूलों के अध्यापकों ने यह सवाल किए। राज्यभर मेें अनुसूचित जाति के 14 स्कूल समाज कल्याण और जनजाति के 30 स्कूल जनजाति कल्याण संचालित कर रहा है, इसमें समाज कल्याण के हरिद्वार में तीन, पौड़ी में एक और दस स्कूल पिथौरागढ़ जिले में है। वहीं, जनजाति कल्याण के अधिकांश स्कूल ऊधमसिंह नगर जिले में खुले हैं। देहरादून में भी कई स्कूल हैं। कुछ साल पहले जनजाति स्कूल भी समाज कल्याण के अधीन ही थे।
संयुक्त निदेशक ने बताया कि जनजाति और अनुसूचित जाति स्कूलों की रिपोर्ट तैयार की तो तब वेतन विसंगतियाें का खुलासा हुआ। जनजाति स्कूलों के अध्यापक को 35 से 40 हजार प्रति माह वेतन मिल रहा है, जबकि अनुसूचित जाति के अध्यापकोें को 14 हजार से 20 हजार के बीच में वेतन मिलता है।
मंत्री ने ली स्कूलों की सुध
- समाज कल्याण मंत्री सुरेंद्र राकेश ने अनुसूचित जाति के स्कूलों की सुध है। इनके अध्यापकों का वेतन जनजाति स्कूलों के अध्यापकों के समान करने के लिए मंथन शुरू हो गया है। संयुक्त निदेशक की रिपोर्ट पर मंत्री ने इसे गंभीरता से लिया है।

तीन स्कूलों के अध्यापकों को नहीं मिला आठ माह से वेतन
- धारचूला क्षेत्र के तीनों स्कूलों के अध्यापकों को आठ माह से वेतन नहीं मिला है। संयुक्त निदेशक से दीवाली से पहले वेतन दिलवाने की गुहार लगाई है। ये अध्यापक 30 सालों से स्कूलों में कार्यरत हैं, अब इनका वेतन करीब 14 हजार रुपये हुआ है।
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