नदियों के निजीकरण पर केंद्रीय मंत्रालय की निगाह

Nainital Updated Sat, 26 Oct 2013 05:44 AM IST
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हल्द्वानी। नदियों के निजीकरण की योजना पर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय निगाह रख रहा है। मंत्रालय और जंगलात से जुड़े अधिकारियों के अनुसार आरक्षित वन क्षेत्र में नदियों को निजी क्षेत्र में देना आसान नहीं होगा। नियम के साथ खिलवाड़ करने पर अनुमति रद्द भी हो सकती है।
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शासन ने कुमाऊं में शारदा और दाबका का काम निजी क्षेत्र में देने की योजना बनाई है, इसका ओपन टेंडर होगा। नदियों के निजीकरण की खबर फैलते ही वन निगम कर्मियों ने मोर्चा खोल दिया है। वहीं, नदियों के निजीकरण से केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के भी कान खड़े हो गए हैं। उसने निजीकरण की प्रक्रिया पर निगाह टिका दी है। मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार वर्तमान परिस्थितियों में आरक्षित वन क्षेत्र की नदियों को निजी क्षेत्र में नहीं दिया जा सकता है, मंत्रालय ने वन निगम को ही सशर्त खनन की अनुमति दी है। इसी के चलते खनन के काम में नेट प्रेजेंट वैल्यू जमा नहीं करनी पड़ती है। निजी क्षेत्र में देने से शर्त का उल्लंघन होगा।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय सेंट्रल रिजीन लखनऊ के मुख्य वन संरक्षक वाईकेएस चौहान कहते हैं कि आरक्षित वन क्षेत्र की गौला, शारदा, दाबका आदि नदियों में खनन का काम जंगलात को दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत वन या वन निगम ही खनन करा सकता है। इसी के चलते नेट प्रेजेंट वैल्यू जमा करने में छूट भी मिलती है। इसमें किसी तरह का बदलाव अगर राज्य सरकार करना चाहती है, तो उसको नए सिरे से खनन का प्रस्ताव तैयार करना होगा। फिर इस पर फारेस्ट एडवॉइजरी कमेटी आदि निर्णय लेगी। मंत्रालय नदियों के निजीकरण के मसले पर नजर रख रहा है। आवश्यकतानुसार हस्तक्षेप करेगा, अगर नियमों का उल्लंघन हुआ, तो अनुमति रद्द भी हो सकती है।
वहीं, जंगलात के अफसर भी वेट एंड वाच की नीति पर चल रहे हैं। हल्द्वानी वन प्रभाग के डीएफओ पंकज कुमार कहते हैं कि अभी लिखित में कोई आदेश नहीं पहुंचा है। ऐसे में कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती है।

सबलेट भी संभव नहीं
हल्द्वानी। वनाधिकारियों के अनुसार अगर वन निगम चाहे तो वह भी टेंडर के माध्यम से काम सबलेट नहीं कर सकता है। यह भी कंजरवेशन एक्ट के खिलाफ होगा। सबलेट करने का मतलब भी निजी क्षेत्र को देना है।
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