रूह की गिजा है कव्वाली

Nainital Updated Fri, 25 Oct 2013 05:43 AM IST
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नैनीताल। रामपुर दरबार घराने के मशहूर कव्वाल वारसी ब्रदर्स के मुखिया मो. अहमद खां कव्वाली को रूह की गिजा (आत्मा का भोजन) के रूप में देखते हैं। कहते हैं कि करीब आठ सौ वर्ष पूर्व शुरु हुई कव्वाली का अतीत समृद्ध रहा है। बीते दशकों में इसमें कुछ कमी जरूर आई, मगर आज कव्वाली फिर अपनी अलग पहचान बना रही है। देश ही नहीं विदेशों में भी लोग इस फन के कायल हैं।
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शरदोत्सव में कव्वाली प्रस्तुत करने आए खां ने कहा कि 800 वर्ष पूर्व मोईन उद्दीन चिश्ती ने कव्वाली की बुनियाद रखी थी। जिसके बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। हजरत अमीर खुसरो ने कव्वाली की परंपरा में को जीवंत रखा। कव्वाली मुख्य रूप से दरगाहों में गाई जाती है। इसकी मदमस्ती के कुछ क्षण ऐसे होते हैं कि आत्मा से परमात्मा के मिलन की अनुभूति होती है।
हालांकि आज के लोग इसे पागलपन का नाम देंगे। लेकिन कव्वाली से जिसने इसका रसपान किया हो वही इसे समझ सकता है। अहमद कहते हैं कि उनके दादा रामपुर घराने में कव्वाली गाते थे। उन्हें कव्वाली विरासत में मिली है। खां विदेशों में भी कई शो कर चुके हैं।
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