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सरकारी अस्पतालों में गरीब नहीं वीआईपी मरीजों का इलाज

Nainital Updated Mon, 11 Feb 2013 05:31 AM IST
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हल्द्वानी। सरकारी अस्पतालों में गरीबों को भले ही दवाएं नहीं मिले, लेकिन रसूख वालों के लिए कोई कमी नहीं है। अस्पताल प्रशासन वीआईपी लोगों के इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ता है। वीआईपी नेताओं से लेकर प्रशासनिक अफसरों के लिए अस्पताल प्रशासन की ओर से बाजार से लोकल पर्चेज (एलपी) पर दवाओं की खरीददारी होती है। वीआईपी भी इस कदर बेशरम हैं कि ब्लड प्रेसर और मधुमेह की मामूली खर्च की दवाएं तक अस्पताल से एलपी कराते हैं।
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आम आदमी के लिए सरकारी अस्पतालों में इलाज कराना खुद की जिंदगी दाव पर लगाने जैसा है। किसी अस्पताल में चिकित्सक नहीं हैं तो किसी अस्पताल में दवाएं। अस्पतालों में गरीबों की कोई सुनवाई नहीं है। इलाज के अभाव में गरीब दम तोड़ देता है। अस्पतालों में हर मर्ज के लिए जेनेरिक दवाएं हैं, लेकिन डाक्टर सरकारी कुर्सी पर बैठकर दवा कंपनियों की सेवा कर रहे हैं। डाक्टर दवा कंपनियों का टारगेट पूरा करने के लिए मरीजों के लिए बाहर से महंगी दवाएं लिखते हैं। इसके एवज में दवा कंपनियां से डाक्टरों को तरह तरह के पैकेज दिए जाते हैं।

वीआईपी मरीजों के लिए इन्हीं अस्पतालों में सभी सुविधाएं हैं। अस्पतालों में फ्री इलाज होने के साथ साथ प्राइवेट वार्ड का शुल्क नहीं लिया जाता है। मसलन, वीआईपी मरीजों को जेनेरिक दवाएं नहीं दी जाती हैं। वीआईपी मरीजों के लिए बाजार से महंगी और नामी कंपनियों की दवाएं खरीदने के लिए स्पेशल कोटा है। यह कोटा है लोकल पर्चेज (एलपी) का। बकायदा इसके लिए शासन से जीओ तक है। जीओ के मुताबिक विधायक, सांसद, मंत्रिगण और बड़े अफसरों के लिए सरकारी अस्पतालों में लोकल पर्चेज पर दवाएं खरीदने का प्रावधान है। इस कोटे में मान्यता प्राप्त पत्रकार भी शामिल हैं। वीआईपी और दूसरे अफसर आर्थिक दृष्टि से पैसे वाले हैं और बाजार से महंगी दवाएं खरीद सकते हैं। लेकिन वीआईपी मरीज गरीबों का हक मारना ही अपना धरम समझते हैं। सरकारी अस्पतालों में एलपी कोटे से वीआईपी मरीजों के लिए लाखों रुपये की दवाओं की खरीद होने से अस्पतालों के बजट में अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है।

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