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वंश नहीं पीढ़ियां याद रखेंगी कनिका को

Nainital Updated Fri, 25 Jan 2013 05:32 AM IST
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हल्द्वानी। बेटियों ने हमेशा वर्जनाएं तोड़कर साहस का परिचय दिया है। बस सदियों के साथ चेहरे बदले हैं और गार्गी, रानी लक्ष्मीबाई जैसे कई नामों से हमारा इतिहास समृद्ध हुआ। इतिहास बनने का सिलसिला अनवरत है। इसलिए बृहस्पतिवार को ‘बेटी बचाओ दिवस’ पर इसमें कनिका जोशी का नाम जोड़ना भी जरूरी हो जाता है। दुख है कि ठीक इस दिन एक बेटी को अपनी मां को मुखाग्नि देनी पड़ी। गर्व है कि एक बेटी ने ठीक इस दिन वह रूढ़ी तोड़ी जिसकी जिम्मेदारी समाज के कुछ ठेकेदार केवल एक बेटे को देते हैं। हालांकि हमारे धर्म ग्रंथों में ऐसा कहीं उल्लेख नहीं है कि ये काम बेटा ही करेगा।
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हल्द्वानी के दीक्षांत इंटरनेशनल स्कूल में प्रशासनिक समन्वयक के पद पर कार्यरत कानिका जोशी अपने माता-पिता की इकलौती संतान हैं। उनका पद कुछ भी हो लेकिन उनकी करनी एक शिक्षक की तरह प्रेरणा है उनके लिए जो बेटियों के खिलाफ हैं। कनिका सीख हैं उनके लिए जो बेटे और बेटियों में सिर्फ इसलिए अंतर करते हैं कि बेटा वंश बढ़ाएगा, बुढ़ापे का सहारा बनेगा, मृत्यु के बाद मुखाग्नि देकर 82 लाख योनियों से मुक्ति दिलाएगा। तीस साल की कनिका इन सारी भ्रांतियों के खिलाफ हैं। कनिका ने जो काम किया है वह पीढ़ियां में होता है। कनिका ने अकेले होते हुए अपने माता-पिता की जो सेवा की वह एक बेटा नहीं कर सकता। एक सप्ताह से बीमार चल रही मां निर्मला जोशी की जब बृहस्पतिवार को मृत्यु हुई तो कनिका ने वह काम भी किया जो इस समाज में केवल बेटे के लिए सुरक्षित रखा गया है। रानीबाग के घाट पर पहुंचकर कनिका ने अपनी मां को अंतिम विदाई दी। इससे पहले वह अपने पिता पीपी जोशी को भी वह मुखाग्नि देकर एक बेटी जिम्मेदारी निभा चुकी हैं।
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