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दवा के साथ ‘दुआ’ भी बांटते हैं डा पंत

Nainital Updated Fri, 28 Dec 2012 05:30 AM IST
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हल्द्वानी। पंतजी डाक्टर हैं और दवा भी देते हैं । लेकिन इतना ही काफी नहीं मानते हैं और साथ में देते हैं दुआ भी। ये दुआ एक औषधीय पौधे के रूप में होती है, जिसे वह खुद एक नर्सरी में पैदा करते हैं। आखिर पेड़ - पौधों की दुआ ही साफ- सुंदर पर्यावरण के रूप में ही वापस हमें मिलती है। याद दिला दें ये वही पंतजी हैं जो रुद्रपुर में डिवाइडर से हरियाली हटाने के खिलाफ खड़े हो गए थे।
डा. आशुतोष पंत आयुर्वेद एवं पंचक्रम चिकित्सा के वरिष्ठ चिकित्सक हैं। हल्द्वानी फतेहपुर (लामाचौड़) स्थित आयुर्वेदिक चिकित्सालय में बतौर प्रभारी चिकित्सा अधिकारी तैनात हैं। अस्पताल में मरीज देखने के अलावा डा. पंत को पर्यावरण संरक्षण का जुनून सवार है। 1988 से डा. पंत अलग-अलग आयुर्वेदिक अस्पतालों में तैनाती के दौरान मरीजों का इलाज करने के साथ-साथ लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करते आ रहे हैं। डा. पंत अपने खर्चे से फलदार और औषधीय पौधे खरीदकर लोगों को बांटते हैं। खासकर, बरसात के सीजन में सुबह अस्पताल खुलने से पहले और शाम को अस्पताल बंद होने के बाद अकेले गांव-गांव जा कर ग्रामीणों को फलदार पौधे बांटते हैं। इस पर डा पंत सालाना दो लाख रुपए खर्च करते हैं।
पौधे बांटने के लिए डा पंत ने फतेहपुर आयुर्वेदिक अस्पताल में ही औषधीय नर्सरी तैयार की है। नर्सरी में हरसिंगार, बालमखीरा, बहेड़ा, अर्जुन, अमलतास के अलावा कई औषधीय पौधे हैं। अधिकतर औषधीय पौधों के पत्ते और फली पेट की बीमारियों एवं हृदय रोगों के लिए रामबाण हैं। अस्पताल में मरीजों की तरह वह नर्सरी की देखभाल करते हैं और अस्पताल आने वाले मरीजों को पर्यावरण बचाने का संदेश देने से नहीं चूकते हैं। अस्पताल में नया मरीज आने पर उसे दवाओं के साथ-साथ औषधीय पौधा थमा देते हैं।
मूलरूप से अल्मोड़ा जिले के खूंट के रहने वाले हैं डा पंत हल्द्वानी में आदर्श नगर में रहते हैं। डा. पंत की पत्नी काशीपुर स्थित डिग्री कालेज में प्राध्यापिका हैं। उनकी एक बेटी भी है। पंतजी कहते हैं, ‘बचपन से शुरू हुए मेरे इस शौक में मेरा पूरा परिवार मदद करता है। फल- फूल के बढ़ते हुए पौधों को देखकर मुझे जो संतोष मिलता है उसका अहसास मैं बयान नहीं कर सकता। वह कहते हैं मैं चाहता हूं कि लोग पौधों की परवरिश बच्चों की तरह करें इसलिए जिनको भेंट करता हूं उनसे उनका अपना हाल जानने के अलावा पौधों का हाल भी पूछता हूं। इससे लोगों में कोमल भावनाएं जाग्रत होती हैं जिनके आज के समाज में खत्म होने का भय पैदा हो गया है’।

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