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पहाड़ में अंधकार, शहर फूंकते हैं बिजली

Nainital

Updated Thu, 13 Dec 2012 05:30 AM IST
हल्द्वानी। ‘बिजली’ जीवन की पहली जरूरत है। या यूं कहें कि बदलती लाइफ स्टाइल में बिन बिजली सब सूना। गांव हो या शहर हर किसी के लिए ये बात फिट बैठनी चाहिए, लेकिन अफसोस। असल में ऐसा नहीं है। बड़े शहरों को बिजली फूंकने की छूट है तो पहाड़ केे साथ व्यवस्था का यहां भी पहाड़ जैसा बर्ताव। इसी का नतीजा है कि जितनी बिजली पहाड़ के चार जिले महीने में खर्चते हैं, उससे 30 लाख यूनिट ज्यादा ऊर्जा अकेले हल्द्वानी महानगर फूंकता है। वह भी तब जब यहां की आबादी और कनेक्शन इन जिलों से भी कम है। औद्योगिक आस्थानों से घिरे तराई में ऊर्जा बचाने का नारा और भी ज्यादा बेदम है। पहाड़ को घंटों अंधकार में रखकर महानगर-तराई रोशन किए जाते हैं और गांवों में आज भी व्यवस्था का अंधेरा है।
कुमाऊं में सर्दी-गर्मी के मौसम चक्र के हिसाब से बिजली की मासिक खपत 350 से 450 मिलियन यूनिट के बीच घूमती है। इसका आधा हिस्सा उद्योगों से भरे तराई को जाता है, तो दूसरे नंबर पर महानगरीय आकार ले चुका हल्द्वानी है, जहां एक लाख 63 हजार उपभोक्ता महीने में 35 से 45 मिलियन यूनिट बिजली फूंकते हैं। इसके विपरीत अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत तथा पिथौरागढ़ जिले का खर्च देखें तो यहां के करीब दो लाख 79 हजार उपभोक्ता महीने में 30 से 35 मिलियन यूनिट तक ही बिजली फूंक पाते हैं।
पहाड़ में बेशक व्यवसायिक उपभोग कम है, लेकिन वहां की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि लोगों को जरूरत के हिसाब से बिजली नहीं मिलती। महानगरों और तराई को रोशन करना ऊर्जा निगम के लिए गांव से ज्यादा जरूरी है। इसीलिए कभी छह तो कभी सात घंटे की कटौती कर इन पर्वतीय जिलों को अंधेरे में रख हल्द्वानी और तराई को रोशन किया जाता है। बिजली के मामले में सबसे ज्यादा गरीब बागेश्वर जिला है। उसके बाद चंपावत में कम बिजली फुंकती है। पिथौरागढ़-अल्मोड़ा में बिजली उपभोग थोड़ा अधिक है, लेकिन आबादी और कनेक्शनों के हिसाब से हल्द्वानी से फिर भी कम।
---इंसेट---
नवंबर माह के खर्च का लेखा-जोखा
जिला आपूर्ति (मि.यू. में) उपभोक्ता
नैनीताल 51.228 163442
अल्मोड़ा 14.155 115609
पिथौरागढ़ 10.687 82661
चंपावत 4.927 36398
बागेश्वर 3.222 44416
ऊधमसिंहनगर 272.404 223939
(स्रोत: यूपीसीएल, हर माह की तस्वीर बिलकुल यही है।)
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यूपीसीएल के अधिकारी यह मानते हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों की अपेक्षा तराई-भाबर में बिजली का खर्च बढ़ने के पीछे हर कार्य बिजली पर निर्भर होना है। व्यवसायिक यूज यहां अधिक है तो, इलेक्ट्रिक उपकरण भी गर्मी हो या सर्दी दोनों मौसम में चलते हैं। कुछ बिजली व्यर्थ भी इस्तेमाल होती है। क्योंकि जरूरत न होने पर भी लोग बल्ब या उपकरणों को चलाए रखते हैं। जबकि पहाड़ में इसका उल्टा है। वितरण खंड के ईई नवीन मिश्रा तथा परीक्षण खंड के डीके जोशी का कहना है कि मार्च से लेकर अक्टूबर तक मांग ज्यादा बढ़ती है। उसके बाद जाड़ों में यह कम होने लगती है, लेकिन खर्च में पहाड़-मैदान में बड़ा अंतर रहता है।
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