ब्यूरा की बेटी, गौला से जीती, कालेज से हारी

Nainital Updated Thu, 13 Dec 2012 05:30 AM IST
हल्द्वानी। पांच साल की दीपा सम्बल ने जब पहली बार गौला पार की थी तो सोचा था कि जग जीत गई। कुछ हद तक उसने ठीक भी सोचा, क्योंकि उफनाती गौला को चीरकर गांव की ये बेटी तब पहली बार स्कूल पहुंची थी। अब दीपा 17 साल की है। 12 साल तक रोज गौला से लड़ने के बाद उसने इंटर की पढ़ाई पूरी की है और अब कालेज जाने का सपना उसकी आंखों में है। लेकिन महंगी होती उच्चशिक्षा का रास्ता गौला से होकर नहीं जाता। कालेज तो हल्द्वानी या नैनीताल में है जहां सरस्वती, लक्ष्मी की गुलाम है। यहां रहकर पढ़ाई के लिए पैसे नहीं रुपये चाहिए और दीपा के माता-पिता की झोली बिल्कुल खाली है, चार भाई बेरोजगार हैं। गौला की लहरों ने तो स्कूल के लिए दीपा का साथ दिया था लेकिन अब कालेज का रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं।
कुमाऊं के महाविद्यालयों में इन दिनों परीक्षा फार्म भरने के लिए छात्र-छात्राओं की भीड़ लगी है लेकिन ये मौका केवल उस छात्र के लिए है जिनके अभिभावकों की जेब कुछ रुपये हैं। अगर पढ़ने का ये अधिकार सबके लिए होता तो हैड़ाखान गांव के ब्यूरा तोक की दीपा भी इस फार्म को भर पाती। दीपा के पास जब मौका था, घर के पास स्कूल था और फीस महज 26 रुपये थी तो वह गौला से लड़ी। उसके पिता मान सिंह ने भी अपनी लाडली को खुशी-खुशी स्कूल भेजा। बेरोजगार भाइयों ने भी जितना कमाया उसमें से कुछ हिस्सा बहन की पढ़ाई पर लगाया। लेकिन अब उनकी भी हिम्मत नहीं कि दीपा को कालेज भेज सकें। मान सिंह कहते हैं पहले सोचा था कि पढ़ लेती तो कुछ कर जाती। लेकिन अब सोचता हूं जितना खर्चा दीपा को हल्द्वानी भेजकर पढ़ाने में है उतने में तो परिवार पल जाएगा।
मां-बाप कि इस मजबूरी को दीपा का दिमाग भी समझता है लेकिन मन का और महत्वाकांक्षाओं का क्या? कालेज में प्रवेश न ले पाने की कसक उसकी बातों में सुनाई देती है। कहती है एक साल बर्बाद हो गया लेकिन जब हम उसे प्राइवेट परीक्षा फार्म भरकर साल बचाने की हिदायत देते हैं तो दीपा की आंखें एकदम चमक उठती हैं। झट से दीपा पूछती है कब तक भर सकते हैं फार्म और कितने पैसे लगेंगे। 1500 रुपये फीस की बात सुनते ही दीपा की आंखें नीचे हो जाती हैं। इस बार मान सिंह बोलते हैं रहने दो साहब क्यों सपने दिखाते हो, 2800 रुपये कितने होते हैं जानते हो। सब चुप हो जाते हैं और दीपा भी अपने डोका पकड़ कालेज की बातें छोड़ घास काटने जंगल की ओर चली जाती है।

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