अमेरिकन डायमंड ने छीना हुनरमंद हाथों का काम

Nainital Updated Mon, 10 Dec 2012 05:30 AM IST
हल्द्वानी। कोयले की खान से मिलने वाले हीरे को तराशकर बेशकीमती बनाने वाले कारीगर भी मामूली इंसान होते हैं। हीरा असली हो या फिर नकली, उसकी चमक हुनरमंद हाथों की कारीगरी पर निर्भर होती है। जयपुरी पत्थर (जर्कन, टोपाज, गारनेट और बीट्स) को तराशकर हीरे की शक्ल देने वाले हाथों का काम छिन रहा है। बाजार में आर्टिफिशियल आभूषणों में अमेरिकन डायमंड का इस्तेमाल होने से पत्थर तराशने वाले कारीगर बेरोजगारी की दहलीज पर आ गए हैं। कारीगरों और हीरा तराशी के व्यवसाय से जुड़े लोगों ने रोजगार के दूसरे विकल्प तलाश लिए हैं।
हीरा अनमोल और हर आदमी की पहुंच में नहीं है। असली हीरा नहीं खरीद पाने वालों के लिए आर्टिफिशियल डायमंड विकल्प रहा है। जयपुरी स्टोन जर्कन, टोपाज, गारनेट और बीट्स कटिंग, तराशी और पालिस होने के बाद हीरे की तरह चमक देता है। पिछले कई सालों से जयपुरी स्टोन आर्टिफिशियल ज्वैलरी में छाया रहा। वर्ष 1988 में अविभाजित उत्तरप्रदेश सरकार ने हल्द्वानी में रत्न उद्यान केंद्र की स्थापना की। केंद्र के लिए 11 एकड़ भूमि लीज पर दी गई। रत्न उद्यान केंद्र का मकसद बेरोजगारों को जयपुरी पत्थरों की कटिंग एवं तराशने की ट्रेनिंग देकर हुनरमंद बनाना था, ताकि लोगों को रोजगार मिल सके। कुशल कारीगरों को स्टोन की कटिंग, तराशी एवं पालिस का उद्योग लगाने के लिए सरकार की तमाम योजनाओं में ऋण भी दिया गया।
रत्न उद्यान केंद्र से ट्रेनिंग लेने के बाद पिछले दो दशकों में हल्द्वानी में करीब एक दर्जन लोगों ने हीरा तराशी एवं कटिंग की मशीनें लगाकर खुद का कारोबार शुरू कर खूब कमाई की। अब बाजार में अमेरिकन डायमंड छाने से जयपुरी स्टोन की मांग गिर गई और कटिंग एवं तराशी उद्योग से जुड़े लोगों की रोजी रोटी पर संकट खड़ा हो गया है।
रत्न उद्यान केंद्र प्रभारी प्रकाश सती बताते हैं कि मार्केट डिमांड कम होने से अधिकतर लोगों ने खुद के कटिंग एवं तराशी उद्योग बंद कर रोजगार के दूसरे विकल्प तलाश लिए। उद्यान केंद्र के पीआरओ शंकर रावत बताते हैं कि उनके यहां गिनेचुने लोग ही ट्रेनिंग के लिए आते हैं। हीरा कटिंग एवं तराशी की मशीनें भी 150 से सिमटकर 25 रह गई हैं। केंद्र महज औपचारिकताएं निभा रहा है।
हीरा तराशी एवं कटिंग के कारोबार से जुड़े नीरज लोशाली कहते हैं कि कटिंग और तराशी का कच्चा माल जयपुर से आता है। माल तैयार होने के बाद वापस जयपुर ही भेज दिया जाता है। कटिंग एवं तराशी का कारोबार जॉब वर्क पर निर्भर है। हल्द्वानी में पत्थरों की कटिंग एवं तराशने की प्रक्रिया मैनुअल है। कच्चा माल महंगा आता है, जबकि मार्केट डिमांड काफी कम हो गई है। अमेरिकन डायमंड की कटिंग एवं फिनिशिंग अत्याधुनिक कंप्यूटराइज मशीनों से होती है, इसमें लागत भी कम आती है। आर्टिफिशियल ज्वैलरी में अमेरिकन डायमंड ही इस्तेमाल हो रहा है।

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