अस्पताल नहीं ये बाबुल का घर था

Nainital Updated Wed, 28 Nov 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। अस्पताल या बाबुल का घर। एक पल के लिए नैना की विदाई को देख नर्सों की आंख में आंसुओं से तो यही लगा था। ये बाबुल ही तो है नैना का, जहां इस एक माह की बिटिया को जीवन मिला। उसकी आंखों को मां की गोद के बजाए अस्पताल मिला था। मंगलवार को मासूम अपनी यादों के सहारे अस्पताल और शहर को छोड़कर चली गई। मासूमियत से इंसानियत के रिश्ते के आगे नन्ही गुड़िया की जुदाई के वक्त मौजूद हर इंसान भावुक हो उठा। अबोध आंखें अब अगले दो माह तक शिशु सदन को ताकती रहेंगी। उसे ममत्व के लिए इतना इंतजार करना होगा। क्योंकि नवजात शिशु को गोद देने से पूर्व 60 दिन तक शिशु सदन रखा जाता है। उसके बाद ही उसे मां मिलेगी। खैर बेटी जहां भी रहेगी उजियारा करेगी।
28 अक्तूबर से सुशीला तिवारी चिकित्सालय में रखी गई 29 दिन की बच्ची को जिला परिवीक्षा अधिकारी (समाज कल्याण) सरोज राणा तथा बाल संरक्षण समिति के सदस्य डा. कमरुद्दीन की देखरेख में सुबह 10 बजे अल्मोड़ा के लिए रवाना किया गया। बाहर खड़े लोग उसकी झलक पाने को बेताब नजर आए, पर नैना को देखने का सौभाग्य किसी को नहीं मिल सका। क्योंकि उसे ऐंबुलेंस में रखकर फटाफट रवाना किया गया। यह अस्पताल बेटी को नया जीवन देने और मां की ममता एक अनजान बिटिया के लिए न्योछावर करने का गवाह बना है।
बाल संरक्षण समिति के सदस्य डा. कमरुद्दीन ने बताया कि माता-पिता बच्ची के लिए जो भी करना चाहें वह शिशु सदन में आकर कर सकते हैं। क्योंकि दो माह नैना को वहीं पर पालापोषा जाएगा। बच्ची को किसी माता-पिता को गोद देने से पूर्व पूरी पड़ताल होती है और अंत में जिला जज की अध्यक्षता में बनी कमेटी ही इस पर फैसला करती है। इसलिए दो माह बाद ही किसी माता-पिता को नैना सौंपी जाएगी। उनका कहना है कि बच्ची को पाने के लिए आवेदन पत्र जिला जज के पास भेजने का नियम है, लेकिन माता-पिता चाहें तो वह शिशु सदन कर्नाटकखोला अल्मोड़ा या फिर बाल संरक्षण समिति नैनीताल को भी आवेदन भेज सकते हैं। इसके अलावा आप उक्त तीनों पतों को संबोधित करते हुए हमारे दिए गए दोनों पतों पर भी आवेदन भेज सकते हैं। हम इसे संबोधित पते पर पहुंचा देंगे।

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