हुनर से लोक को बचाया खुशी ने

Nainital Updated Mon, 19 Nov 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। हर शख्स के अंदर एक हुनर होता है लेकिन ऐसे लोग कम होते हैं, जो इस हुनर को पहचान कर उसका इस्तेमाल बेहतर जीवन जीने और अपने समाज के लिए करते हों। आमतौर पर तो लोग समझौते का जीवन जीते हैं लेकिन पिथौरागढ़ की खुशी जोशी ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने एक तरफ तो अपनी आवाज से पहाड़ के लोकगीतों को नया जीवन देने का काम किया और दूसरी तरफ अंतर्जातीय विवाह कर रूढ़ियों को भी चुनौती दी। पति भी ऐसा चुना जो उनके हुनर के लिए प्रेरणा की तरह काम करता है।
मूलरूप से गंगोलीहाट की रहने वाली खुशी को किसी ने गाना गाना नहीं सिखाया। उनकी आवाज ही ऐसी थी की सुरों को उनका साथ देना पड़ा। पहाड़ी गीतों में आ रही फुहड़ता से निराश खुशी ने अपना पहला गीत दसवीं कक्षा में लिखा। संवेदनाओं से भरा उनका गीत (बौज्यू मैंले ब्या की करियो, बड़ो जुल्म करियो, मेरो मालिक शराबी, शराबी-कबाबी) पहाड़ की महिलाओं के दर्द की एक जीवंत कहानी है। आज खुशी अपने पति गोविंद दिगारी के लिखे गीत ही गाती हैं।
खुशी को अपनी आवाज का जादू बिखरने के लिए पहला मंच अपने स्कूल में मिला था। यहीं खुशी ने हुनर को पहचाना और उसे अपने समाज की उन्नति के लिए इस्तेमाल किया। आज खुशी लोक संस्कृति के लिए समर्पित लोगों के बीच एक जाना-पहचाना नाम है। पहाड़ से प्रेम करने वाले प्रवासियों के बीच भी खुशी की आवाज का जादू चलता है। क्योंकि खुशी की आवाज में वह कसक है जो दिल्ली, मुंबई में गीत गाकर पहाड़ का पूरा चित्र खींच सकती हैं। इन महानगरों के अलावा खुशी सेना और झुमिगो में भी कई कार्यक्रम कर चुकी हैं। आज उनकी आय का साधन भी उनका हुनर है। खुशी और उनके पति एक महीने में 10 से अधिक शो करते हैं। खुशी कहती हैं कि पहाड़ी लोक गीतों को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है कि उनमें वास्तविकता लाई जाए। पहाड़ के संवेदनशील मुद्दों को लोग गीतों के जरिये उठाया जाए ताकि लोगों का सीधा जुड़ाव अपनी संस्कृति से हो सके।

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