पचास साल में दो बार छोड़ना पड़ा घर

Nainital Updated Sun, 18 Nov 2012 12:00 PM IST
हल्द्वानी। 1962 में भारत-चीन विवाद के बाद दोनों देशों के बीच सीमा व्यापार बंद होने से आई विपन्नता को जोहारी समाज ने आखिर जीत लिया। व्यापार बंद होने के बाद रोजीरोटी पर संकट के कारण 50 साल पहले जोहारी समाज के लोगों को मल्ला जोहार से पलायन करना पड़ा था। करीब दो हजार परिवार तल्ला जोहार और मुनस्यारी में आकर बसे थे। लेकिन आर्थिक तंगी ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा। 1974 में जोहार के लोगों का यहां से भी पलायन शुरू हुआ। 38 साल में ही करीब 1200 परिवारों ने तल्ला जोहार को छोड़ा। करीब चार सौ परिवार हल्द्वानी में आकर बसे।
इतने बड़े बिखराव के बावजूद जोहारी समाज ने अपनी संस्कृति और परंपराओं से संबंध बनाए रखा। जोहारी समाज के प्रमुख व्यक्ति और एलआईसी से रिटायर्ड सचिव गजेंद्र सिंह पांगती कहते हैं कि जोहार समाज ने अपने गांवों को फिर आबाद करने का फैसला लिया है। श्री पांगती ने बताया कि इससे पहले भी 600 ई. में भी जोहार को उजड़ना पड़ा था लेकिन 1450 में शुरू हुए भारत-तिब्बत व्यापार ने एक बार फिर गांवों के आबाद होने की राह खोली थी। इसका उल्लेख उन्होंने अपनी किताब जोहार किंकर-बाबू राम सिंह में भी किया है। श्री पांगती बताते हैं कि ताउम्र प्रवास और पलायन से संघर्ष करने वाले जोहारी समाज की ताकत उसकी संस्कृति है। इस संस्कृति का ही दम है कि 50 सालों से परिस्थितियां जिस मल्ला जोहार को उजाड़ने में लगी हैं उसे वहां की संस्कृति और संस्कृति के लिए समर्पित लोग फिर बसा देते हैं। इसी का परिणाम है कि आज फिर मल्ला जोहार के घरों को लोग मिले हैं।

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